> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अद्वितीय मिलन

तुमको जो बिठाया मन-मंदिर में,
जलाया दीप वर्षों तक यादों का,
लौ में ख्वाहिशें सब खाक हो गयी हैं,
नहीं इन्तजार अब तुमसे मिलन का|

नैनों को जाने क्या हो गया है,
तुम्हारी मूरत दिखती है हरपल,
दूर नहीं पल भर के लिए भी,
मेरी रूह तुम्हारी रूह में है शामिल|

(c) हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 19 नवंबर 2011

एक प्रार्थना - माँ के लिए


उनकी सांसों से बनी धडकन मेरी,
तन में बिजली सी दौड़ गयी,
खून से उनके प्यास मेरी बुझती रही,
रुधिर तन में  सुधा बन गयी |

निवाला उनका मैंने भी खाया
स्वाद, सेहत से भरपूर ,
कुर्बानियों से पला-बढ़ा उनकी
करती रहीं जो उन्हें, हरपल मजबूर|

उनके करम से ही हुआ मजबूत मैं,
कैसे चुकाऊं क़र्ज़ - उनके दूध का,
हे विधाता! हर एक सांस मेरी ले लो,
पर सजा-संवार दो बुढ़ापा उनका|

हे मालिक,  संसार के नियामक!
ग़मों का साया रहे सदा उनसे दूर,
कटे सुख से जीवन की शाम,
माँ को  खुशियाँ मिलें भरपूर|


(c) हेमंत कुमार दुबे

Teardrops of moon

Silently weeps the moon
Over the shoulders of the hills
And the drops of tears
Spread in the air
Embracing everything they touch,
The fog makes visibility poor
And the heart sinks
Thinking of the coldness,
Of the long winter nights,
And the coldness of governments
Towards the tsunami of poor -
Hungry human children,
The jobless marooned youth, and
The senior elderly people, who
Roam in the night
And sleep without bed on street,
Bearing the burnt of poverty,
And carelessness of the civic society.

The winter has set-in -
In the moral values,
In the thinking of the well-to-do,
In the heart of society, but
When the sun will shine again tommorow,
The teardrop of the moon
Will glisten in the light
On the garden and wayside grass,
Telling the humanity to remember
The cold freezing night.

(c) Hemant Kumar Dubey

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

दीप जलाओ, दीप जलाओ



दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आई दिवाली रे|

लक्ष्मी-गणेश को घर में लाओ,
प्रेम-भक्ति से पूजन करके,
मेवे-मिठाईयों का भोग लगाओ,
सबको खिलाओ, खुद भी खाओ,
आई दिवाली रे|

आस-पड़ोस में खुशियाँ बाँटो,
सबके मन को हर्षित करते,
नाचो गाओ, धूम मचाओ,
आई दिवाली रे|

आत्मपद में प्रतिष्ठित होने को,
जल्दी-जल्दी कदम बढाओ,
दीप जलाओ, तम को भगाओ,
आई दिवाली रे!


(C) हेमंत कुमार दुबे

दीपोत्सव २०११ पर हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

"दीपावली कैसे मनाएँ" लिंक पर क्लिक करें और विडियो देखें !!

साभार व सादर,

हेमंत कुमार दुबे

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

तुम्हारा खजाना


तुमने सदियों से,
जन्म-जन्मान्तरों से,
व्यक्त-अव्यक्त
बाँटा है खुले हाथ
वह खजाना,
जिसकी चाहत खुटती नहीं,
जिस पर कायम है
तुम्हारा संसार -
वह प्यार है !

(c) Hemant Kumar Dubey

God's Voices


Sitting on the branch of mango tree,
Amongst the green leaves,
You pour out your necter
Of universal love in a voice
That is melodious and sweet,
One that fills the heart
With love and peace.

God I hear you everywhere -
In cry of child, the calling of calfs,
The laughter of newly wed,
The chirp of the birds,
In the rustling of the tree leaves,
While also in the flow of wild streams,
In the thunder of the clouds,
The rumbling of the train,
And where not, you tell me.

In the murmering prayers,
The temple bells' ringing,
The music of orchestra,
The song of the singers,
The doorbell and the chime,
The humming of the bee,
Your sound is everywhere.

My heart pounds, and
The sound fill the ears, the mind,
And makes me realise
Your presence inside-outside me.

(c) Hemant Kumar Dubey

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

मिठ्ठू मियां


“आम ले लो, आम !!”
फेरीवाले ने आवाज़ लगाई,
कच्चे-पक्के आमों ने
फिर तुम्हारी याद दिलाई |

मैना के संग बगीचे में
तुम्ही रोज बतियाते थे
कच्चे-पक्के आमों को
तुम साखों से गिरते थे |


बचपन के उन दिनों में
करना चाहता था प्यार,
तुम चंचल, नटखट को
अपने नन्हें हाथों से पकड़कर |


जमीं पर बैठते जब तुम
मैं दौड़ा चला जाता,
उड़ जाते थे तभी,
मैं रोता, माँ को बुलाता |

समय बीता, मैं बड़ा हुआ,
स्कूल छोड़ा, कॉलेज गया,
तमन्ना बचपन की जिन्दा रही,
क्या हुआ जो मैं बड़ा हुआ |

दैव-वश एक दिन ऐसा हुआ,
तुम बंधे नरपाश में
बेबस, बेसहारा, सिसकते से
आ गए मेरे सामने |

हाय! कैसा निर्दयी बहेलिया!
क्रोध अपना रोक मैं मुस्कुराया,
“कितने में दे दोगे भैया,
मान जाओ ले लो दस रुपैया |”


समवेत स्वर से दोंस्तों ने
फिर तुम्हे नाम दिया,
क्या हिंदू, क्या मुसलमान,
सभी बोले तुम्हें ‘मिठ्ठू मियां’|

तुम्हें आज़ादी की राह दिखाई
पिंजरे को खोलकर,
पर दैव, यह क्या हुआ –
तुम चलने लगे उड़ना भूलकर !

माथे पर हाथ रख,
मैं बैठा सोचता रहा,
‘यह हो नहीं सकता’
मन ही मन कहता रहा |


टेबलों, कुर्सियों पर फुदकते,
एक नई जिम्मेदारी बन गए,
कटे परों के साथ तुम
दया-करूणा के पात्र बन गए |


रात हुई और तुम सोये
मेरी चारपाई के नीचे,
और मैं जागता रहा रातभर
बिस्तर पर आँखों को भींचे |

कौवों, गौरयों, मैनाओं का स्वर
भोर में मुझे जगा नहीं पाया,
उठा देर से जब अलसाते,
तुम्हें आस-पास कहीं नहीं पाया |


अपनी खिडकी से नीचे देखा,
दो कौवे मंडरा रहे थे,
सड़क पर पड़ा हुआ कुछ
नोंच-नोंच खा रहे थे |

तभी किसी ने आवाज़ दी,
“भाई, तेरा तोता उड़ गया”,
मेरी सांस अटक-सी गयी,
मेरे भीतर कुछ मर-सा गया |

लख-चौरासी के इस छोर पर
बेसब्री से इंतज़ार है,
मानव बन तुम आओगे,
आस अब भी बाकी है |


© हेमंत कुमार दुबे


सोमवार, 26 सितंबर 2011

मेरे प्रभु!


मेरी हर एक साँस तुम्हारी है,
जैसे हैं हवा, पानी और जमीन,
सुबह की धूप, खुशबू तुम्हारी है
तुमसे ही परिपूर्ण है मेरा जीवन |


तुम तो करते कुछ भी नहीं
सब होता स्वत: कर्मों का परिणाम,
फिर भी सह लेते हर आक्षेप
माता-पिता, बंधू-सखा हो तुम |

मेरे प्रभु, तुम-सा कोई नहीं,
पीछे, अभी, आगे भी नहीं ,
जीवन-प्राण आधार मेरे तुम,
तुममे मुझमें कुछ भेद नहीं  !

(c) हेमंत कुमार दुबे

सोमवार, 19 सितंबर 2011

कविता


कविता बनती नहीं है
लबों पर आ जाती है,
कुछ पलों के लिए
मानस पर छा जाती है|

फूल पर मडराते हुए
भ्रमर की नादानी है
कभी खुशी, कभी गम
जिंदगी की कहानी है |

एक करिश्मा सी है,
खुदा की इनायत है,
कुछ तो सुकून मिले
दिल में अगर दर्द है|

हर चोट का मरहम
आंसूओं की कहानी है
कभी आँखों की चमक
कभी बहता पानी है|

इस गंगा में डुबकी
ईश्वर तक  है पहुंचाती,
टूटे स्वप्नों को जोडती
मुस्कान होठों पर लाती|


(c) हेमंत कुमार दुबे

रविवार, 18 सितंबर 2011

स्पर्श










लाग-इन करके फेसबुक पर,
मेरी प्रोफाइल पर जब तुम आती,
सुबह की गुनगुनी धूप में,
वो कमल कली सी खिल जाती,
फिर भंवरें गूंजते कवि-मन के,
सुरमयी-मधुमय होता समां|


पसंद 'गर तुम्हे आये कुछ
बस 'लाइक' कर देना
एक स्पर्श ही काफी है तुम्हारा
मेरा दिन बनाने को|

(c) हेमंत कुमार दुबे