हर दिल में बसे गोपाल श्याम।।
शेष, महेश, सुर सब गुण गाएँ।
गोपिन संग छाछ पर नाच दिखाएँ।।
नारद, व्यास भी पार न पाएं।
प्रेम सुधा से जग को भिगोएं।।
'अव्यक्त' मांगे भक्ति का वर दान।
नटखट कान्हा में बसे मन प्रान।।
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कवितायें जो मैं लिखता हूँ / मेरे जीवन की हैं कहानी / जो देखा-सुना इस संसार में / तस्वीरें कुछ नई, कुछ पुरानी // आएँ पढ़ें मेरी जीवन गाथा / जिसमें मैं और मेरा प्यार / आत्म-शांति अनुभूति की बातें / बेताब पाने को आपका दुलार...//
लेखक: Hemant • तिथि: 23 जनवरी 2026
वर दे, वर दे, वीणा वादिनी,
ज्ञान-भक्ति से भर दे।
नव-प्रकाश जीवन में आए,
सकल सुमंगल कर दे।
सभी स्वस्थ, सुखी, प्रसन्न,
भक्ति-रस से भर दे।
हरि-नाम में प्रीत जगे,
हृदय सरस मधुर कर दे।
वर दे, वर दे, वीणावादिनी,
वर दे, वर दे, वीणावादिनी।
वाग्देवी, वाणी की रानी,
मधुर स्वर में नाद भर।
मूढ़ मन के तम को हर ले,
बुद्धि में उजियारा कर।
शब्द-शब्द में सत्य की रेखा,
अर्थ-दीप प्रज्वलित हो।
करुणा-धारा बहती रहे,
मन में शांति प्रतिष्ठित हो।
वर दे, वर दे, वीणावादिनी,
वर दे, वर दे, वीणावादिनी।
कर्म बने पूजा की धारा,
सेवा में आनंद मिले।
रोज़मर्रा के क्षुद्र क्षण भी,
धर्म-दीप से दीप्त खिलें।
संगत सच्ची, सद्गुरु-कृपा,
मार्ग सदा सुगम कर दे।
अहं मिटे, विनय जगे,
चित्त निरंतर निर्मल कर दे।
वर दे, वर दे, वीणावादिनी,
वर दे, वर दे, वीणावादिनी।
राग-रंग में रमे नाद ऐसा,
जो अंतर्यामी को छू ले।
ताल-लय में बँधे प्रार्थना,
जो हर पीर को धूल दे।
गृह-आँगन में मंगल-गान,
हँसी-खुशी के स्वर भर दे।
बाल-मन में जिज्ञासा जगे,
वृद्ध-हृदय को बल भर दे।
वर दे, वर दे, वीणावादिनी,
वर दे, वर दे, वीणावादिनी।
ध्यान-दीपक जले निरंतर,
श्वास-श्वास में नाम रहे।
नीर-क्षीर सा भेद मिटे,
सबमें एक ही राम रहे।
पाप-ताप सब दूर हों माता,
सत्कल्पनाएँ फल दें।
जीवन-वीणा के हर तार में,
प्रेम-प्रभा को पल दें।
वर दे, वर दे, वीणावादिनी,
वर दे, वर दे, वीणावादिनी।
प्रस्तुत है अभियंता दिवस पर विश्व-अभियंता को समर्पित एक काव्य प्रार्थना और सर्वजन के लिए शुभकामना। इस कविता में एक ऐसी दृष्टि है जो विज्ञान, आध्यात्म और सृजनशीलता को एक सूत्र में पिरोती है। यह कविता न केवल अभियंता 🛠️ दिवस पर हृदय का उद्गार है, बल्कि उस दिव्य अभियंता की स्तुति भी है, जिसने हमें सृजन की शक्ति दी। यह कविता एक प्रार्थना की तरह है, जो मानव की रचनात्मकता को परमेश्वर की दिव्य योजना से जोड़ती है:
जिसने रचा ब्रह्मांड का नक्शा,
हर तारे को दिया पथ अपना।
जिसकी सोच में छिपा विज्ञान,
वही है सृष्टि का मूल विधान।।
धरती, जल, अग्नि, आकाश,
उसके संकेतों में सबका प्रकाश।
जीव और निर्जीव का संतुलन,
उसके कोड में है हर अनुशासन।।
उसने मानव को दिया विचार,
दिया सृजन का भी अधिकार।
हाथों में दी योजनाओं की शक्ति,
मन में भरी नवाचार की युक्ति।।
हर पुल, हर भवन, हर मशीन,
उसकी प्रेरणा से होता सृजन नवीन।
हम सब अभियंता हैं उसके वंश,
हमारे कार्य हैं उसके ही लघुत्मांश।।
वह परम अभियंता, परम ज्ञानी,
जिसकी रचनाओं का न कोई सानी।
हम उसकी योजना के लघु-निर्माता,
उसके स्वप्न के जीवित द्रष्टा।।
"हे ईश्वर! आप ही है कोड का मूल,
आपके बिना सब अधूरा, सब निर्मूल।
आपकी कृपा से चलता है यह यंत्र,
आपके आदेश से है गति और तंत्र।।"
"हे प्रभु, आपको हम करें प्रणाम,
आपकी कृपा से करें सब काम।
आपकी रचना में हम रचें नया और अच्छा,
हर आविष्कार पवित्र और सच्चा।।"
अभियांत्रिकी का हो शुभ विचार,
हर सृजन में हो मंगल नवाचार।
हर कर्म बने एक दिव्य साधना,
अभियंता दिवस पर यही शुभकामना।।
🪷🙏🪷🙏🪷🙏🪷🙏🪷🙏🪷🙏
✍️ हेमंत कुमार दुबे ‘अव्यक्त’ · 📍 गाज़ियाबाद · 🗓️
थोड़ी धूप थोड़ी छांव है जिंदगी
एक अलसाई सी सुबह में
गो खुरों की उड़ाई धूल से अटी
भारत का एक गांव है जिंदगी।
कभी अतीत को पलट कर देखती
वर्तमान को संवारती है जिंदगी
शाम के धुंधलके में देहरी पर बैठी
अंत को तलाशती उदास है जिंदगी।
कभी अपनों से झिड़क को सहती
परायों में अपनापन ढ़ूंढ़ती है जिंदगी
औरों पर हंसती कभी खुद पर मुस्कराती
कभी आंसू की नदी बहाती है जिंदगी।
कभी फूल के परागों का गुलाल लगे
कभी पल्ले आया बवाल लगे जिंदगी
अक्सर तो गणित का सवाल लगे
कभी सुंदर स्वप्न संसार लगे जिंदगी।
शहर की आपाधापी में जंजाल लगे
तो कभी चकाचौंध में मायाजाल जिंदगी
एक-एक पाई के लिए लड़ती-भिड़ती
कभी थकी-सी तो कभी बेमिसाल जिंदगी।
✍️
हेमंत कुमार दुबे ‘अव्यक्त’
📍 गाज़ियाबाद |
🗓️
सच्चा प्यार ना बदले कभी
ना वक्त की चाल से,
ना हालात के झंझावात से
न दुख की काली रात से।
जब पहली बार देखा था,
वो पल दिल में जिंदा है
तेरी मुस्कान की मासूमियत,
हर मौसम में मेरी हिम्मत है।
न वक्त छीन पाया वो एहसास,
न दूरी ने कम की वो प्यास
तेरे नाम की जो धुन बसी है
वो मेरी हर धड़कन में है खास।
ये प्यार मेरा सच्चा है,
बदलना इसकी फितरत नहीं
ये तो वो दीपक है ‘अव्यक्त’,
आँधियों में जो बुझता नहीं।
✍️
हेमंत कुमार दुबे ‘अव्यक्त’
📍 गाज़ियाबाद |
🗓️
जैन-दर्शन की दीप-शिखा,
वैदिक धर्म की ज्योति,
क्षमा से ही मिलते हैं,
मोक्ष-मार्ग के मोती।
क्रोध-द्वेष की जंजीरें तोड़े,
यह जीवन की संजीवनी,
देवत्व की राह दिखाए,
क्षमा में है दिव्यता घनी।
न यह कोई दुर्बलता है,
न यह कोई हार,
बल की यह पराकाष्ठा है,
शांति का उपहार।
कर्म-बंधन से मुक्ति दिलाए,
आत्मा को करे शुद्ध,
ब्रह्म-ज्ञान की सीढ़ी बनकर,
जीवन बनाये परम बुद्ध।
मन में जो क्षमा बसाए,
‘अव्यक्त’ वही है सच्चा ज्ञानी,
उसके भावों में बसती है,
शांति और मीठी वाणी।
जैन-शास्त्र कहें “मुक्ति का द्वार”,
वेद कहें “ब्रह्म का सार”,
क्षमा है वह दिव्य प्रकाश,
जो करे जीवन को उजियार।
लिखना पढ़ना अच्छा लगता है
पर कुछ भी लिखा नहीं
कई महीने गुजर गए हैं
फिर भी लेखनी उठी नहीं
शरद ऋतु हो गई शेष
वसंत का हो गया प्रवेश
आज कवि के हृदयांगन में
स्फुरित हुए हैं शब्द विशेष
नभ में चंद्र सूर्य संगम
प्रातः अरूण प्रभा गहराई है
शीतल मंद पवन बहती स्वछंद
कुसुमित बगिया में तरुणाई है
शंख घड़ियाल कर रहे नाद
मंत्रोच्चार आरती ध्वनि छाई है
पुष्प हस्त में लिए अलि
पीली चुनर उसकी लहराई है
जय घोष कर रहे भक्त
घंटा ध्वनि सुनाई दी है
सब पूर्ण काम हो जायेंगे
अव्यक्त प्रतीति मन आई है।
@ हेमंत कुमार दूबे 'अव्यक्त'
04.03.2025