कवितायें जो मैं लिखता हूँ / मेरे जीवन की हैं कहानी / जो देखा-सुना इस संसार में / तस्वीरें कुछ नई, कुछ पुरानी // आएँ पढ़ें मेरी जीवन गाथा / जिसमें मैं और मेरा प्यार / आत्म-शांति अनुभूति की बातें / बेताब पाने को आपका दुलार...//
गुरुवार, 7 जून 2012
गुरुवार, 24 मई 2012
Prayer for a friend
Your face so glowing brightly
Like the full moon in the sky
Your lips like the rose petals
Eyes like the lotus
I thank God
Who creates both even and odd
For the beautiful creations
And the nice connections
His gift to me
Of your friendship true
To warm my winter days
Lighten up my dark pathways.
My prayer to the Almighty
The Supreme Deity
With murmuring lips
And folded hands -
May you live till the Sun shines
With lots of fun & wellness
And may your wisdom spread
Throughout the world.
(C) Hemant Kumar Dubey
Written on 10-Jan-2007
रविवार, 19 फ़रवरी 2012
चुनावी दंगल
दंगल देखने के लिए
उत्सुक
नारे लगाती हुई जनता
जुटी है अपने-अपने
मनसूबे से
मैदान के चारों तरफ
|
पहलवान अपने तन पर
लज्जा को ढकने के
लिए
पहने हैं सिर्फ
लंगोट,
बाकी अंग
वस्त्रविहीन |
ये नेताओं से अच्छे
हैं,
जो खड़े चुनावी दंगल
में,
फिरते सड़कों पर,
मोहल्ले की गलियों
में,
उछालते कीचड विरोधियों
पर,
उड़ाते धूल
चार-पहियों से
जनता की आँखों में |
नेताओं के तन पर
सफ़ेद कपड़े होते हैं,
पर
दिल से होते है नंगे,
काले, भेड़ियों जैसे|
अच्छा व्यक्ति भी
संग इनके,
बनता है धूर्त
भेड़िया,
औरों का हक खाने
वाला,
पत्तल में छेद करने
वाला|
नेता और उनके चमचे,
जब आ जाते हैं,
जनता बोलती नहीं,
सिर्फ सुनती है, और
देती है अपना
निर्णय,
चुनावी दंगल में वोट
ड़ालकर |
(c) हेमंत कुमार दुबे
रविवार, 12 फ़रवरी 2012
प्यार का त्यौहार
प्यार का त्यौहार जब
मनाओगे,
दोगे प्रेमिका को फूल
और तोहफा,
मत भूलना उस दिन उनको,
जिनके प्यार ने तुम्हें
जन्माया,
पाला-पोसा, बड़ा किया,
वो ही, जिन्हें तुमने
प्रेमिका के नैनों से
डसे जाने के पहले,
किया है जान से बढ़कर
प्यार|
१४ फरवरी को मनाओ,
दिवस मातृ-पितृ पूजन
का,
और पूजो अपने जन्मदाता
को,
रोली-चंदन लगाकर,
आरती उतारकर,
चरणों में सिर झुकाकर,
क्योंकि –
वही करते हैं सच्चा
प्यार तुमसे,
बाकी तो सारे बुनते है,
जाल छलावों के|
माँ-बाप ही सच्चे
हितैषी,
रब से मिलानेवाले हैं,
और तो सब साथी स्वार्थ
के,
चमड़ी के प्रेमी हैं|
अगर होता सच्चा
प्रेमी-प्रेमिका का
प्यार,
तो कभी टूटते न दिल,
न बिखरता घर-संसार |
आर्य! धोखे में आना
नहीं,
पश्चिम की जहरीली हवा
से,
वहाँ की चकाचौंध से,
क्योंकि एक दिन ऐसा
होगा -
दम घुटने लगेगा तुम्हारा
भी,
जैसे घुटता है उनका,
भोगी संस्कृति के जो पोषक,
और जो पा रहे हैं
नव-जीवन
तुम्हारी निर्मल हवा से,
आध्यात्मिक संस्कृति से|
जो बन रही पश्चिम का
जीवन,
पूरब की उस अपनी बयार
को, अगर
तुम ही दूषित बनाओगे,
फिर कैसे जी पाओगे|
सुन्दर चमड़ी से नहीं,
प्यार करो आत्म से,
ईश्वर से, खुदा से,
अपने माँ-बाप से,
भाई-बहन से,
हर जीव में बैठे रब से|
(C) हेमंत कुमार दुबे
कृपया यह भी देखें : १४ फरवरी को क्या करें ?
गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012
सुप्रभात
उषाकाल कमरे में आना,
चाय की प्याली के साथ
कोमल, गर्म – नरम हाथों से
दे जाना गालों पर -
एक थपथपाहट|
धीरे से खिड़कियों के परदे खिसकाना,
लौह-जालियों के बीच से,
गुनगुनी धूप का छन-छन,
कमरे को रोशनी से भर जाना|
तुम्हारी उंगलियां जब हौले से छुएंगी,
मेरे अर्धोन्मीलित नेत्र देखेंगे -
तुम्हारे गुलाबी होठों पर
स्निग्ध मंद-स्मित, और
दिल की धडकन कहेगी –
सुप्रभात, मेरे प्यार|
(c) हेमंत कुमार दुबे
चाय की प्याली के साथ
कोमल, गर्म – नरम हाथों से
दे जाना गालों पर -
एक थपथपाहट|
धीरे से खिड़कियों के परदे खिसकाना,
लौह-जालियों के बीच से,
गुनगुनी धूप का छन-छन,
कमरे को रोशनी से भर जाना|
तुम्हारी उंगलियां जब हौले से छुएंगी,
मेरे अर्धोन्मीलित नेत्र देखेंगे -
तुम्हारे गुलाबी होठों पर
स्निग्ध मंद-स्मित, और
दिल की धडकन कहेगी –
सुप्रभात, मेरे प्यार|
(c) हेमंत कुमार दुबे
लेबल: कविताएँ, हेमंत
गुड मोर्निंग,
गुलाबी,
चाय,
दिल,
धड़कन,
धूप,
प्यार,
सुप्रभात,
Good Morning
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
प्रश्नों के उत्तर
मैं,
अयोध्या नरेश राम,
तुमसे कहता हूँ,
तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर,
क्यों नहीं रखा नगर में,
अपनी गर्भिणी सीता को,
क्यों भेजा वन में ?
जंगल में ही तो ईश्वर प्राप्त रहते है,
और फिर वाल्मीकि का संग,
उनकी अमूल्य शिक्षा,
क्या मिल पाती तुम्हें अवध में?
लव-कुश,
अगर होते तुम अयोध्या में,
क्या तुम मुझ जैसे बन पाते,
फिर माँ तुम्हारी,
मेरी जानकी,
धरती पुत्री,
अपनों के बीच ही तो रही,
दूर नहीं थी मुझ से,
वन में रह कर भी,
यह तो कष्ट सहा,
केवल तुम्हारे लिए,
तुम्हें निखारने के लिए|
(c) हेमंत कुमार दुबे
गणतंत्र दिवस मनाना है
गणतंत्र दिवस जब हम मनाते है,
राष्ट्रीय-गान जब गाते हैं,
रेडियो या टीवी पर देख-सुन
बहादुर बच्चों को, जांबाजों को,
हथियारों के प्रदर्शन को,
रंग-बिरंगी झांकियों को,
पारंपरिक नृत्यों को,
कुछ पल के लिए ही सही,
देश से जुड़ जाते हैं|
देशभक्ति तो सबके अंदर है,
अपनी आत्मा की तरह,
पर प्रतिदिन उसका गला घोंटने,
उसको मारने का काम,
हमलोग ही तो करते हैं|
गणतंत्र दिवस हम मनाएंगे,
अपने लिए,
अगली पीढ़ी के लिए,
क्योंकि जीने के लिए
जैसे जरूरी है साँसें,
उसी तरह जरूरी है देश-प्रेम,
थोडा सी सही,
पर निश्चित तौर पर|
क्योंकि तभी तो
देश के नौनिहाल आगे बढ़ेंगे,
थामेंगे तिरंगा,
पहनेंगे फिर गाँधी टोपी,
अन्ना, अरविन्द या किरण के संग,
मिल कर बोलेंगे –
भष्टाचार मिटाना है|
गणतंत्र दिवस मनाना है,
देश-भक्ति को जगाना है,
क्योंकि देश से ही,
वजूद है हमारा|
(c) हेमंत कुमार दुबे
लेबल: कविताएँ, हेमंत
अन्ना,
किरण,
गणतंत्र दिवस,
गाँधी,
देश,
देश-भक्ति,
भ्रष्टाचार,
Republic Day
रविवार, 15 जनवरी 2012
माँ, तेरी याद आती है
दिन के उजालों में,
रात के अंधेरों में,
सुबह की धूप में,
दोपहर की तपिस में,
शाम के धुंधलके में,
दीपक की लौ में,
रसोई में बनते हुए,
हलवे की सुगंध में,
माँ, तेरी याद आती है|
अँधेरे से जब डरता हूँ,
कहीं लड़खड़ा कर गिरता हूँ,
उठता हूँ, संभालता हूँ,
तेरा ही नाम लेता हूँ,
माँ, तेरी याद आती है |
चाँद को देखता हूँ -
लगता है तेरा प्यार,
छन-छन कर,
पेड़ों के पत्तों बीच से,
मुझ पर बरसता है,
आह्लादित करता है,
माँ, तेरी याद आती है|
चिड़िया को देखता हूँ,
चोंच में दाना लिए,
घोसले पर बैठ कर,
ची-ची करते बच्चों संग,
माँ, तेरी याद आती है|
पार्क की बेंच पर,
देखता हूँ बैठे हुए,
जब किसी को बुनते,
रंग-बिरंगे स्वेटर,
माँ, तेरी याद आती है|
जीवन की आपा-धापी,
अब रास नहीं आती है,
पर पेट तो पालना है,
बच्चों को जिलाना है,
कर्तव्यों को निभाना है,
शहर की भीड़-भाड़ में,
खो गया हूँ पर,
माँ, तेरी याद आती है|
जानता हूँ गांव का जीवन -
शांत, सुखी, अच्छा है,
हरियाली है, खुशहाली है,
आ नहीं सकता काट कर,
अभी अपने शहरी बंधन,
मुझे मुक्त करने आजा,
माँ, तेरी याद आती है|
(c) हेमंत कुमार दुबे
शुक्रवार, 13 जनवरी 2012
आत्मचिंतन
जिंदगी ख्वाब है,
ख्वाबों में भी जिंदगी है
दोनों ही झूठे,
केवल तुम सच्चे हो|
सच की परिभाषा
सच ही जाने,
बाकी सब तो हैं
झूठे झूठके दीवाने|
दिखता है जो
मिट जायेगा,
चाहे हकीकत
या हो सपना|
जिससे दिखता है
उसको जब जानो,
सब विस्तार तुम्हारा,
फिर भी तुम निर्लेप -- सच्चे|
(C) हेमंत कुमार दुबे
** सदगुरूदेव भगवान के प्रवचन और कृपाप्रसाद से जो जाना वही कविता के रूप में प्रस्तुत किया हूँ **
रविवार, 8 जनवरी 2012
सदस्यता लें
संदेश (Atom)








