> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : मनमोहन

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गुरुवार, 7 जून 2012

उलझन



भ्रष्ट नीतियों से हुई देश की बेहाली पर रोयें
या बढ़ती मंहंगाई से अपनी तंगहाली पर रोयें
हमारे ही नोटों से सत्ता काबिज करने वाले
बता दे ओ मन के मोहन पहले किस पर रोयें ?

(c) हेमंत कुमार दुबे