> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : मंहंगाई

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मंगलवार, 25 सितंबर 2012

यह कैसा सरदार देश में?




गुरु गोविन्द थे बड़े महान
बनाई एक फ़ौज शक्तिशाली
अपनी धरती माँ कि खातिर
सरदारों की कौम बनाई
एक-एक सरदार लड़ा देश की खातिर
बलिदान आज सब करते याद
मिली आज़ादी भारत को
बहाया खून सरदारों ने जब
भाग गए अंग्रेज लुटेरे
भारत का झंडा फहराया
एक भगत सिंह जिसने झेली फांसी
दिया अपना सर्वोच्च बलिदान
अब यह कैसा सरदार देश में
जिसके शासन में जनता लाचार
मंहगाई के कोडे खाती
जिसने दे दी जन को फांसी
लटक रहा जनता का पुतला
हर घर की खूंटी से

गोरी मेम की करता जी हजूरी
उसकी इच्छा करता पूरी
देश का पैसा बाहर जाये
चाहे कोई लूट ले जाये
छूट देता आया गैरों को
अपनों को तो सिर्फ बरगलाया

२जी, कामनवेल्थ गेम में
कोलगेट के काले खेल में
देश का धन खूब लुटाया
मंहगाई बढ़ा-बढ़ा कर
जन की कमर तोड़ दी इसने
कहता है मैं ईमानदार हूँ
पर क्या बेईमानों का सरदार नहीं है?

बेईमानी पनपी और फूली
भ्रष्टों की भर गई झोली
धूल डाल जन की आँखों में
देश बेचने की कोशिश हो ली

सरदारों से बचा था देश
विदेशों में नाम कमाया
डालर देश में उनसे आया 
जग में भारत का झंडा लहराया
पर यह कैसा सरदार देश में?
यह कैसा सरदार देश में ?

(c) हेमंत कुमार दूबे

गुरुवार, 7 जून 2012

उलझन



भ्रष्ट नीतियों से हुई देश की बेहाली पर रोयें
या बढ़ती मंहंगाई से अपनी तंगहाली पर रोयें
हमारे ही नोटों से सत्ता काबिज करने वाले
बता दे ओ मन के मोहन पहले किस पर रोयें ?

(c) हेमंत कुमार दुबे