> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : महसूस तुझे है करना

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

महसूस तुझे है करना



बरसों की चुप्पी के बाद
जब बजेगी फोन की घंटी
क्या होगा मेरा हाल
सोच सिहर उठता है बदन

जब गूंजेंगे कानों में
बोल तुम्हारे खनकते हुए
चूडियों की तरह
और वही पुरानी चिर-परिचित
सुबह के समय चहचहाती चिड़ियों सी
सुनाई देगी मृदुल हँसी

ढो रहा इस तन को कबसे
तेरी खातिर
क्या जिन्दा हो जाऊँगा?
या फिर
मन्त्र-मुग्ध सा
सपनों में खो जाऊँगा?
या खुशी के मारे
दिल पर काबू न पाकर
एक बार पुन: मर जाऊँगा?

क्या होगा अंजाम मेरा
इस चक्कर में नहीं पड़ना
तेरे बोली को सुन
जीवित हो कर
महसूस तुझे है करना
दूर सही मीलों तुझसे
पर क्षण भर का सुख पाकर
स्वीकार मुझे है मरना|
 

(c)  हेमंत कुमार दुबे

3 टिप्‍पणियां:

  1. सूरज की रौशनी फूंट पड़ी हो जैसे मन के अनुरागी आँगन में काव्य की स्नेहिल सी बयार बह रही हो रोम रोम ॐ हो गया .....अद्भुद रचना को कोटि कोटि नमन .....नई कविता की नव परम्परा के द्योतकों सच आने वाला कल हमारा है महिमामंडित मंच की गौरव गाथा में चार चाँद लगाती अद्भुद रचना के सिपहियों की फ़ौज में सर्वदा आपका नाम अग्रणी रहे इसी अभिलाषा के साथ =वन्देमातरम

    अरविन्द योगी

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