> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

माँ शारदा

वंदना करूँ मैं हे माँ शारदे
वीणा की तारें झंकृत कर दें
चहुं ओर ॐ का गुंजन हो
सोहंम भाव हृदय में भर दें

तरू तरू कुसुमित हो बसंत
रंग-बिरंगी धरती कर दें
विमल विवेक जगे मानस में
हर भक्ति मार्ग प्रशस्त कर दें

भारत भूमि स्वर्ग से सुंदर
सुंदर जन गण मन कर दें
'अव्यक्त' भाव चरण की सेवा
निज आशीष कृतार्थ कर दें

गुरू चरणों में अनुराग बढ़े
गुरू सेवा में अग्रसर कर दें
ब्रह्मज्ञान में रमण करें नित
वीणावादिनी वाणी वर दें।

(C) हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'
माघ शुक्ल, बसंत पंचमी, विक्रम संवत 2073
http://www.hemantdubey.com

🌸🌼जय माँ वीणापाणि सरस्वती 🌷💐🙏
🙏🌷जय गुरूजी🌷🙏

रविवार, 13 नवंबर 2016

मेरे कान्हा


कान्हा ऐसे ही मुरली बजाते रहना
जहाँ देखूं तुम ही तुम नजर आना
तुम साथ हो कान्हा तो मुझे क्या कमी है
मैं दीवानी हुई जबसे मुरली की धुन सुनी है
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

आशा व विश्वास

बस लिखते रहता हूँ
मन को बहलाता रहता हूँ
कोई तो शब्द पहुंचेंगा
कभी तो जवाब मिलेगा
कोई तो रास्ता निकलेगा
कभी तो मुरझाया फूल खिलेगा
आशा की जीत होगी
दोनों तरफ शांति होगी
'अव्यक्त' बात व्यक्त होगी
प्रीत परिपक्व होगी।

© हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'
13.11.2014

शनिवार, 12 नवंबर 2016

सुनो तितली



हे तितली, तुम ईश्वर की सुंदर रचना
क्या तुम अपने सौंदर्य को जानती हो?
हाथ बढाकर क्यों नहीं पकड़ा तुम्हें
क्या तुम इसका कारण जानती हो?

तुम्हारी सुंदरता का मैं कायल हूँ
तुम्हारी चंचलता मन को मोहती है
नन्हें रंगबिरंगे पंखों का फड़फड़ाना
तुम्हारा उड़ना मुझे अच्छा लगता है

तुम्हारी उड़ान में महसूस करता हूँ
मानो मेरे पंख है और मैं उड़ रहा हूँ
फूलों को देख कर खुश हो जाता हूँ
उनमें भी खुद को ही तो देखता हूँ।

तितली, तुम मन को आंदोलित करती
तुम्हारे कारण ही धरती का श्रृंगार है
तुम्हारी स्वछंदता को नहीं बांधता क्योंकि
व्यक्त में अव्यक्त को तुमसे प्यार है।

© हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'
12.11.2016, नई दिल्ली

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

Wheels

The revolving wheels of vehicles
Always mesmerized me,  then
When I was a child
Going to home town in planes
From the young Himalayan Hills
Long journey of half a week
And now when I have grown
Through the years gone
Life seems exactly the same
Mechanical like the wheel
Running monotonously
But mesmerizing to onlookers
And taking me to the place
Where every journey ends.

© Hemant Kumar Dubey 'Avyakt'
14.12.2015, New Delhi
Facebook page: http://bit.ly/1QAEGIN

सोमवार, 4 जनवरी 2016

The first stopover

The road to my destination was clear
The Sun was going down
And there I lay on the path
Tired but smiling
I had started on a journey
Which I believe will give
Unlimited fun
And the much needed happiness
For years to come,  and this
My first stopover I looked over
Just a few more steps ahead.

- © Hemant Kumar Dubey 'Avyakt'

रविवार, 20 दिसंबर 2015

मेरा धर्म

बुतों को पूजना चाहो तो भले पूजो मेरे भाई
मेरा तो धर्म इंसानियत यह अव्यक्त कहता है।
© हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'
इन पंक्तियों के साथ ही मैंने अव्यक्त उपनाम चुना है आगे की कविताओं के लिए लिये।

ब्रह्म की बात

ब्रह्मज्ञानी का शिष्य हूँ,
ब्रह्म में रमण करता हूँ,
ब्राह्मण कहलाता हूँ
मैं ब्रह्म का अनन्य अंश हूँ
अव्यक्त नाम मेरा
न कोई वैरी मेरा
न कोई मित्र मेरा
न ये चोला मेरा
चहुँओर व्याप्त ब्रह्म है
उसके नाटक का अंश है
भ्रम का पर्दा हटाना है
यही ब्रह्म का आदेश है |

- हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

'अव्यक्त' का अनुरोध

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अव्यक्त का संदेश

सतगुरू बापू से जो सिखा वही संदेश लिखा है
चलता संसार एक मालिक से जिसका नाम लिखा है
जो हर क्षण रहता है सबके दिलों में प्यार बनकर
उस अगम अज अगोचर का अव्यक्त नाम लिखा है
रास्ते पर किसी भी चलो धर्म का नाम लेकर
मंजिल एक सबकी ग्रंथों में अलग नाम लिखा है
मजहबी बंदों के नाम यही एक पैगाम लिखा है
हेमंत अनाम इस जहाँ में अव्यक्त नाम लिखा है।
© हेमंत कुमार दुबे 'अव्यक्त'