देश के उन शासकों को कहूँगा
जिनने बेच दी है आत्मा अपनी
अब धृतराष्ट्र बने बैठे हैं
आमादा है देश बेचने को
ओट ले विदेशी निवेश का
और जो कहते हैं जनता से
पैसे पेड़ पर नहीं लगते
दशकों तक किया तुमने शासन
लूट तुम्हारी अब भी बाकी है
सींचा नहीं धरा को तुमने
पौध रोपना भी बाकी है
उम्र बहुत हो चुकी मगर
भूख पैसे की बाकी है
आँखों पर चश्मा चढ़ा
मगर रतौंधी काफी है
दीखता नहीं स्वार्थी तुम्हें
आगे हरियाली काफी है
लगाओ, सींचो पेड़ अगर तुम
फल रूपी पैसे काफी हैं ..
तुममें नहीं मगर हममें
देश-प्रेम अभी काफी है
अब भी सुधर जाओ वर्ना
जन दरबार में नहीं माफ़ी है ..
(c) हेमंत कुमार दूबे






