> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : तुलसी के प्रश्न

गुरुवार, 20 जून 2013

तुलसी के प्रश्न


 
 
 
तू जानती है मुझको

क्योंकि

रहती हूँ तेरे घर में

और फिर

तुझसे पूछते हैं लोग

मेरे बारे में

क्योंकि

जिसे जग पूजता है

जिसके बिना भगवान

अतृप्त रह जाते हैं

जो औषधि बन

दूर करती है अनेकों बीमारियाँ

शारीरिक, मानसिक या अध्यात्मिक

और जिसके पास बैठने से

मिलती है शांति

वह मैं हूँ -

तेरे आंगन में उपेक्षित

तुलसी

 

कुछ प्रश्न मुझे सालते हैं

टीस से कराहती हूँ -

क्यों न बदली तेरी सोच

तेरी करनी

और मैं क्यों हुई उपेक्षित

रोज के एक लोटे जल से

सूखने को मजबूर

 

ईश्वर ने पनपाया मुझको

तेरे आँगन में

पर

प्राणिमात्र को आराम देने वाली

सबके सुख-दुःख की संगी

क्या प्यासे मारना है मेरी नियति है?

पूछ रही हूँ तुझसे

मैं तेरे आँगन की तुलसी |
 
 
(c) हेमंत कुमार दुबे

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