> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : पैसों का प्रभाव

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

पैसों का प्रभाव



बेटा  क्या, क्यों और किससे  पढ़ेगा ,
सब   तय  हो  जाता  है ,
जेबों   में  जब  न  हो  लक्ष्मी ,
सब गुड़-गोबर  हो  जाता  है |

बूढों  की  कौन  करेगा  सेवा ,
इस  पर  होड़  मच  जाती  है ,
पितृदेव  कहलाते  पापा ,
जब  मोटी  पेंसन  आती  है |

जन्मदिन  पर  बच्चों  के ,
दादा  जब  देते  नहीं  उपहार ,
बेटा-बहू होते नाराज़  
भूलते  माँ -बाप  के  उपकार |

भाई-भाई को तोड़ रहा
दोस्त बन जाते अनजान ,
बेमानी बने सब रिश्ते-नाते
पैसा बन गया है शैतान | 


(C) सर्वाधिकार सुरक्षित - हेमंत कुमार दुबे  

2 टिप्‍पणियां:

  1. स्वार्थ की भीड़ में रिश्तों की पहचान गुम हो गई है
    महानगरों में तो बस लम्बी गाड़ियां हैं
    चमचमाती विज्ञापन सी नकली मुस्कान ...
    सेवा ?
    अमां तुम किस वतन के हो कहाँ की बात करते हो ?

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