> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : मैं और मेरी चाहत

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

मैं और मेरी चाहत

नहीं चाहता लिखना,
कोई कहानी,
या कविता,
क्योंकि -
दोनों ही उपजेंगे 
दिलो-दिमाग से,
स्वप्नवत |

नहीं चाहता देखना
कोई नई जगह,
नया दृष्य,
क्योंकि -
जो शाश्वत नहीं
उसे क्या देखना |

नहीं करना चाहता
तदात्म,
झूठ से,
झूठी दुनिया से,
क्योंकि - 
वह मैं  नहीं | 

ठहरो -
मैं करता हूँ
तदात्म,
खोल ज्ञान-चक्षु ,
निज - स्वरुप से |

बदल - अबदल में,
सत्य - असत्य में, 
धूप  - छांव में, 
मैं ही तो हूँ |

इसलिए तो लिखता हूँ ,
देखता हूँ,
पढ़ता हूँ,
सुनता हूँ , 
अनगिनत हाथों, नेत्रों, कानों से
और रहता हूँ 
हरपल हर जगह |

2 टिप्‍पणियां:

  1. इसलिए तो लिखता हूँ ,
    देखता हूँ,
    पढ़ता हूँ,
    सुनता हूँ ,
    अनगिनत हाथों, नेत्रों, कानों से
    और रहता हूँ
    हरपल हर जगह |

    बहुत सुंदर पावन भाव... उस सर्वशक्तिमान की उपस्थिति भला कौन नकार सकता है.....

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