> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

क्यों?



एक वो दिन जब प्यार भरे खत
डाकिया हर हफ्ते दे जाता था
तुम्हारे हाथों की खुशबू पाकर
मेरा गुलशन महक जाता था

जो दिल की जुबानी लिखी मैंने
तो ऐसा क्या हुआ और क्यों
गुस्ताखी ऐसी क्या हो गयी
तेरी चाहत में जहर घुला क्यों

तुमने नफ़रत भरा खत लिखा
मैंने फिर भी तुमसे प्यार किया
कभी मिलोगी तो पूछूँगा, क्यों
इस आस में एक उम्र गुजार दिया|

(c) हेमंत कुमार दुबे

याद कर बचपन के दिन





शब्दों की चहलकदमी से
चलो आज चुप्पियों को तोड़ते हैं
याद कर बचपन के दिन
एक नया रिश्ता जोड़ते हैं

भटक रहे थे बड़ी देर से हम
मार्ग-दर्शन एक-दूजे का करते हैं
ब्रह्मपुत्र में बड़ी दूर आईं किश्तियाँ
फिर से किनारों की ओर मोड़ते हैं

चलो पगडंडियों पर चलते हुए
पहाड़ी पर इन्द्र-धनुष देखते हैं
देवपानी नदी के तट पर
चमकीले-चिकने कंकड खोजते हैं

रोइंग की न्यू कालोनी में
खेल वही पुराने खेलते हैं
लौट आएँगी वही खुशियाँ
बिखरे मोतियों को पिरोते हैं

सुंदर शब्दों के अरण्य में
चलो भविष्य पथ खोजते हैं
कुछ कहते कुछ सुनते
संग जीवन में आगे बढते हैं|

(c) हेमंत कुमार दुबे
http://poetrystream.blogspot.com

शायद तुमने महसूस किया



तुम्हारी खनकती हुई हंसी में
मैंने एक दर्द महसूस किया
जो लम्हा बातों में बीता
उस वक्त को मैंने जिया

कहने सुनने की बात बहुत
अधरों ने लेकिन साथ न दिया
महसूस किया जो मैंने
शायद तुमने महसूस किया|

(c) हेमंत कुमार दुबे

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

महसूस तुझे है करना



बरसों की चुप्पी के बाद
जब बजेगी फोन की घंटी
क्या होगा मेरा हाल
सोच सिहर उठता है बदन

जब गूंजेंगे कानों में
बोल तुम्हारे खनकते हुए
चूडियों की तरह
और वही पुरानी चिर-परिचित
सुबह के समय चहचहाती चिड़ियों सी
सुनाई देगी मृदुल हँसी

ढो रहा इस तन को कबसे
तेरी खातिर
क्या जिन्दा हो जाऊँगा?
या फिर
मन्त्र-मुग्ध सा
सपनों में खो जाऊँगा?
या खुशी के मारे
दिल पर काबू न पाकर
एक बार पुन: मर जाऊँगा?

क्या होगा अंजाम मेरा
इस चक्कर में नहीं पड़ना
तेरे बोली को सुन
जीवित हो कर
महसूस तुझे है करना
दूर सही मीलों तुझसे
पर क्षण भर का सुख पाकर
स्वीकार मुझे है मरना|
 

(c)  हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

तुझको कैसे भुलाऊं और क्यों..



दिल में जब तेरी मूरत बिठाई है
दीवालों पर तस्वीर सजाऊं क्यों
बसता है जब तू मेरी सांसों में
तुझको कैसे  भुलाऊं और क्यों..


दिलबर तू करता हर इच्छा पूरी
नश्वर चाहों के लिए दौडाऊं क्यों
मन तुझ में ही रम रहा है
संसार में फिर रमाऊँ क्यों .....

हर खुशी और गम में तू शामिल है
तुझसे फिर कुछ भी छुपाऊं क्यों
एकमात्र तू ही सलाहकार है मेरा
गोपनीयता  कैसे निभाऊं और क्यों  ...

(c) हेमंत कुमार दुबे




१४ फ़रवरी

 

जब खुद से पूछा, किसने मुझसे सच्चा प्यार किया है

कौन है वो शख्स जिसने जीवन को गुलजार किया है 

हँसा-रोया कौन मेरे संग, किसने मेरे लिए कष्ट सहा है

सुनाता हूँ सुनो गौर से, मेरे दिल ने आज क्या कहा है

 

सबसे पहले दिल ने एक सुन्दर चलचित्र दिखाया है

नेपथ्य से आती आवाजों ने दृश्यों को समझाया है

बचपन से जवानी तक सफ़र फिर से दिखलाया है

हर तस्वीर में माता-पिता का चेहरा नजर आया है

 

तथ्यों को भूला बैठा था, सच्चाई से मुँह मोड़ा था

झूठे प्रेम का दीवाना बना, सच्चे प्रेम को छोड़ा था

पश्चात्य संस्कृति के चक्कर में जो पड़ा हुआ था

आदर्शों से दूर हुआ मैं, भटकता हुआ भगोड़ा था

 

नजरों से निहाल करते माता-पिता मेरे नजर आये

उनके प्रेम-प्रकाश के आगे कोई नहीं जो टिक पाये

प्रेम का दम भरने वाली प्रेमिका ने भी गम हैं दिये

माता-पिता ही सच्चे हितैषी सुख-दुःख में सच्चे साये

 

निःस्वार्थ प्रेम जो करते हमसे उनका ही गुण गायें

फूल गुलाब का उन्हें भेंट दे चरणों में शीश झुकाएं

आओ १४ फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएँ

माता-पिता की सेवा से अपना जीवन सफल बनाएं|

 

(c) हेमंत कुमार दुबे

मनमीत




जो रोज याद आते हैं वे दिल में बसे होते है
उनको याद करते ही जीवन में फूल खिलते हैं
महकती हैं साँसें चहुँओर संगीत होता है
बहती है जीवन-धारा वे मनमीत होते हैं ......


(c) हेमंत कुमार दुबे

रविवार, 27 जनवरी 2013

कैसे तुमसे नैन मिलाऊँ...



दिल में जो तुम बसती हो
खिलखिला कर हँसती हो
साँसे चुपके से कहती हैं
कैसे उनको चुप कराऊँ....

रात के नीरव अंधियारे में
तुम्हें ढूँढने हाथ बढ़ाऊँ
चिहुँक अकेले में डरकर
नैनों से जल बरसाऊँ...

रात जागते कब मैं सोया
रोज प्रात मैं समझ न पाऊँ
याद तुम्हारी तकियों पर
अपने हाथों कैसे मिटाऊँ ...

सबसे छुपाऊं
कुछ न बताऊँ
शर्माता सकुचाता हूँ मैं
कैसे तुमसे नैन मिलाऊँ...

(c) हेमंत कुमार दुबे

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

प्रश्न




सुलग रही है अपनी जिंदगी 
देख कर समाज में दरिंदगी
अजनबी हो रही है मानवता
बढ़ रही समाज में कायरता
मिट रही है दिलों से ममता
बढ़ रहा कर्तव्य पलायानता
प्रश्न हर नागरिक करता है
वह जो प्रेम-शांति से रहता है
खुद को ही अब मैं जला दूँ
या दरिंदों को ही झोक दूँ?
मिटा दूँ देश समाज के द्रोही 
या कायरता से मिटना है सही?


(c) हेमंत कुमार दूबे


रविवार, 9 दिसंबर 2012

कसक



जब मिली थी तुम पहली बार
उसने कहा था तुमसे
'मिलने आया हूँ क्योंकि
सपने में तुमने मुझे बुलाया है
आज सबेरे ही
मुर्गे ने बाग दे जगाया है
और जो हो सकता है साकार
उस स्वप्न से कैसे करूँ इंकार?'

शर्मा कर तुम्हारा मुस्कुराना
उसके साथ बेंच पर बैठ जाना
आत्मीयता से बतियाना
कुछ सुनना कुछ सुनाना
उसे भा गया
तुम्हारे मन में कुछ है
बता गया

मुलाकातों का
बैठकों का
मीठी बातों का
सपनों का
सिलसिला चलता रहा
न तुमने कहा
न उसने कहा
प्यार भीतर-भीतर पलता रहा

तुम्हें जीवन में आगे बढ़ना था
किसी बंधन में नहीं बंधना था
उसको नियति पर नहीं भरोसा था
और नियति ने उसके लिए
कुछ और ही सोचा था

राहें जुदा हुईं
एक मोड़ पर तुम फिर मिले
अस्वीकृति के डर ने
मन का चलने न दिया
उसने लबों को सी दिया
मन को समझा दिया
प्यार को दफना दिया

उसके अन्दर
कसक है
टीस है
भीड़ में तन्हाई है
जिंदगी से रुसवाई है

कसकता है
देख तुम्हारा मशीनी जीवन
सुबह से शाम की थकन
न चैन, न आराम
सिर्फ भागमभाग

तुम्हारे लिए कुछ न कर पाने की
मजबूरी अपनी देख
वह कराह उठता है
दर्द से तडपता है

सीने में दफ़न
प्यार की मजार पर
रोते दिल को देखकर
पल-पल उठती है कसक -
अनजान डर से क्यों डरता रहा
जुदा होकर पल-पल मरता रहा
क्यों न किया इजहार
जब किया तुमसे प्यार
तीन शब्द
जिंदगी बदल जाते शायद|

(c) हेमंत कुमार दूबे