> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक

रविवार, 31 मार्च 2013

तुम पुकार लेना



तुमने शुभ रात्रि नहीं कहा
वक्त जो तुम्हें नहीं मिला
और प्रेमी बैठा हुआ
रात भर
कर रहा इंतज़ार
तुम्हारे ई-सन्देश के आने का

दर्द दिया तो सहता है
तुम्हारे दर्द से मिला दर्द
और चाहो तो पूछ लेना
उसके तकिये से
जिसने समेटा है समंदर
भावों का
और जिसपर चल पड़ी हैं
नदियों की धाराएँ

कैसा ये प्यार है
दर्द देता है
रूठता है
मनाता है
जानता है परिणाम
फिर भी बेवकूफी करता है
चुभो कर अपने ही दिल में
अपने हाथों से खंजर
मरहम भी खुद ही लगता है

जानता है
जुदा होकर जी न पायेगा
पर क्यों करता है
अपना ही खून
यह जान न पाता है
क्योंकि
यही शायद संसारी माया है
जिसने
उसे बार-बार भरमाया है

जानती हो
प्रेमी तुम बिन
बेशक मर जाएगा
जो तुमको एक पल के लिए भी
अपने पास नहीं पायेगा
इसलिए
सुबह की पहली किरण
जब दे दरवाजे पर दस्तक
तुम पुकार लेना
उसका नाम
जो तुम्हारी जिंदगी है
जैसे तुम उसकी हो
सिर्फ उसकी|

(c) हेमंत कुमार दुबे

प्यार है तुमसे कैसे समझाऊं


 
प्रिये, काँटों भरा प्रेम पंथ है
फिर भी मैं चलता ही जाऊं
हर पल तेरी याद सताये
निर्झर नीर नैनों से बहाऊं

मीलों की दूरी कैसे मिटाऊं
विरह वेदना कैसे दिखलाऊं
तुझ संग प्रीत लगाई प्रीतम
कब और क्यों कैसे बतलाऊं

जब हर न पाऊं पथ बाधा को
क्यों जोर से नहीं चिल्लाऊं
चोट लगी जब दिल पर मेरे
तुझे हाल कैसे न बताऊं

आग लगी जीवन नदिया में
किस पानी से इसे बुझाऊं
तपन मेरी महसूस न तुमको
कैसे मैं शीतल बन जाऊं

तेरा हर दुःख मेरा है प्रीतम
प्यार है तुमसे कैसे समझाऊं
जीना मरना है अब तेरे लिए
किस तरह से तुम्हें बताऊं |


(c)  हेमंत कुमार दुबे

बुधवार, 27 मार्च 2013

आज आई है होली, बहन भाई




आज आई है होली, बहन भाई
राधा के संग खेलें कन्हाई

भीड़ अपार नन्द बाबा के द्वार
ब्रज में धूम मची है चहुँ ओर

गोपाल उड़ावत हैं अबीर, गुलाल
जय जय धुनि करत ग्वाल-बाल

गावत कबीरा आये भोले शंकर
दुष्टों के लिए जो है प्रलयंकर

करताल, ढोल, मृदंग, वीणा बाजे
अप्सरा नाचें, अनूठे रूप में देव साजे

चलो साथी हम श्याम को रिझाएँ
मिल-जुलकर उल्लास का पर्व मनाएँ|



- होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! प्रेम और भाईचारे का यह पर्व पूरे उमंग से मनायें और सभी भेदभाव भूल जाएँ | हम सभी ईश्वर में एक ही हैं यह भावना दृढ करते जाएँ |
© हेमंत कुमार दुबे

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

निष्कपट प्यार




उसे मेरी जरूरत नहीं है
फिर भी उसके पास रहता हूँ
जाने कब जरूरत पड़ जाये उसे
और उस समय मैं ना रहूँ
वह तकलीफ पाए
और वह तकलीफ
जिंदगी भर का दर्द दे जाए
उसे और मुझे

कोई तो समझाये उसे
दुत्कार सहकर भी चिपकना
निगाहों में रखना
मेरा स्वार्थ नहीं
निष्कपट प्यार है|

(c) हेमंत कुमार दुबे

गुरुवार, 14 मार्च 2013

भगवन सुन लो मेरी पुकार


 
भगवन तुमसे क्या छिपा है मेरा दर्द
मेरी बेचैन निगाहें
मेरा तडपता तन-मन
मेरे खून के आँसू
जो मेरे प्रिय को मुझसे दूर किया
 
तुम तो लिखते हो
विधाता तक की तक़दीर
क्यों लिख दिया फिर तुमने
मेरी तक़दीर में प्रिय का विछोह

बदल सकते हो तो बदल दो
वर्ना ले लो अपना यह अंग-वस्त्र
मिला दो पञ्च तत्वों में
ताकि
हवा बन सांसों में उसकी बसूँ
जल बन बादलों से गिरूँ
छू लूँ उसे
वह भीग जाए मेरे प्यार में
अग्नि रूप दीपक में
उसके घर को करूँ प्रकाशित
सूर्य बन चमकूँ
उसे देखूं प्रतिदिन
नीले अम्बर में तारा बन चमकूँ
उसे निहारूँ
जब खड़ी हो आँगन में
मिट्टी में मिलूँ
बीज संग उपजूं
उसकी फूलों की क्यारी में
खिलूँ फूल बन
महकूँ
उसे देख मुस्कुराऊं
और जब वह छूले मुझको
निहाल हो जाऊं
 
भगवन
इस बेचैन तन मन के
तुम्हीं आश्रय दाता
घट-घट वासी अंतर्यामी
करो मुझे इस पार या उस पार
 
अगर स्वीकार है मेरी आराधना
अगर तुम सच में हो
तो सुन लो मेरी पुकार
भगवन
यह तन और मन
कैसे भी मिला दो
मेरे प्रीतम से

क्योंकि
जब मैं तुमसे दूरी नहीं सह पाता
तो उससे दूरी कैसे सही जाय
आखिर उसमें भी तो
तुम्हारा ही नूर है|

(c) हेमंत कुमार दुबे

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अब न दगा देगा



जिसने जुदाई का दर्द दिया है
मिलन रूपी दवा भी वही देगा
पावों में चलने की शक्ति दी
मंजिल तक पहुंचा भी वही देगा

जिसने रुख मोड़ा जिंदगी का
रास्ता और दिशा वही देगा
छुडाया था साथ जिसने
कभी तो मिला ही देगा

दिवार बनाई थी जिसने
एक दिन ढहा भी वही देगा
भरोसा था भरोसा रहेगा
मेरा यार है वो अब न दगा देगा |

(C) हेमंत कुमार दुबे
 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हम




सखी
इधर उधर क्या देखती हो
चंचल नैनों से
क्या मुझे ढूँढती हो?

हवाओं ने जो तरंगें
तुम्हारे कानों तक पहुंचाईं
उन तरंगों में
मैं हूँ

अरे सखी
अभी तुम्हारा पल्लू खिसकाया जिसने
वह पवन भी मैं हूँ

तुम्हारे पैरों की थिरकन
पायल की छम-छम
नृत्य और गीत
और कोई नहीं
मैं ही हूँ
मनमीत

मत देखो इत-उत
थोड़ी देर के लिए
कर लो आँखें बंद
सांसों की गति को
कर लो मंद –
तालबद्ध

कुछ सोचना नहीं
मन को भटकाना नहीं
बाधित करो चंचल को!

झाँकों, भीतर
गहरे
और गहरे
सुनो अंतर्नाद
महसूस करो आह्लाद

तुम्हारी रगों में
नस-नाडीयों में
सांसों में
धडकन में
एक संगीत बज रहा है

प्यारी सखी
अपने में जागो
सुनो यह ब्रह्मनाद
अनादिकाल से
जो बज रहा है

देखो, अपनी दिव्य दृष्टि से
कण-कण में व्याप्त
जिसे लोग कहते हैं
ईश्वर की सृष्टि
वह हमसे अलग नहीं
परिवर्तित होती
क्षण-क्षण उपजती
विलीन होती
अपना ही पसरा है
द्वैत नहीं कहीं
अद्वैत हम
अद्वैत हमारा है

दूर नहीं
विलग नहीं तुमसे
अब मत ढूँढना मुझको
मिला-मिलाया तुमसे
तुममें रचा बसा मैं
मुझमें तुम

एक
अचल
अनादि
अविनाशी
सब घटवासी
यत्र-तत्र
सर्वत्र
हम
और केवल
हम|

(c) हेमंत कुमार दुबे

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

सात क्षणिकाएँ




                  (१)

अनामिका जब भी उठती है
मिल कर अंगूठे संग चलती है
निश्चय जानो शुभ होता है
भाल तिलक होता विजय होती है|


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                 (२)

एक झलक मिल गयी खुदा के पैगाम की
धीरे से चंद लफ़्ज जो तुमने कह दिया
एक आस बांध गयी विश्वास बढ़ गया
रेत पर जो तुमने मेरा नाम लिख दिया...
 
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                 (३)
 
प्यार के बारे में पूछा जो उनसे
न इजहार किया, न इन्कार किया
नजर भर के देखा, मुस्कुरा दिया
मैं पागल दीवाना हो गया |
 
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                  (४)
 
कुछ और नहीं तो इतना करना
जब डोली उठे पिय घर के लिए
नैनों से दो मोती लुढ़का देना
दौलत बन जायेंगे मेरे सफ़र के लिए |
 
 
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                   (५)
 
मेरी जिंदगी की अजब कहानी है
धूप छाँव की जुबानी है
यहाँ तक तो चल जाएगा
कमबख्त रात क्यों होती है|
 
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                   (६)
 
भगवन
जो जुदाई का दर्द दिया तुमने
आँसू नहीं निकले बाहर
भीतर ही जहर बन गए
मैं हँस नहीं सकता
रो भी नहीं सकता
पल पल मर रहा हूँ
बचा सकते हो
यही चुनौती है
तुम्हारे लिए..
 
******************************
 
                   (७)
 
मेरा खत उसके दुश्मन को दिला दिया
बेदर्दी से दो दिलों का खून हो गया
मैंने माना तुमको अपना सखा भगवन,
छलिया, तुमने हमें ही छल लिया|
 
(c) हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

मैं क्या करूँ?


 

 
मेरे दिल की बात को न समझी तू
हो रही नाराज सदा, मैं क्या करूँ ?

पीने को मैंने दिया दूध का प्याला
तुझे नजर आया जहर, मैं क्या करूँ?

निःस्वार्थ प्यार किया तुझसे जानी
तुझे दिखा स्वार्थी रूप, मैं क्या करूँ?

तपती दोपहरी में लाया वृक्ष की छाँव
तूने फिर भी खोजी धूप, मैं क्या करूँ?

सुगन्धित सुमन माला मैंने पहनाई
तुझे लगी लौह जंजीर, मैं क्या करूँ?

कर्मों का सब हेर फेर मैं समझ गया
तू समझ न पाए तो बता, मैं क्या करूँ?

 
(c) हेमंत कुमार दुबे

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

तेरे लिए




जिन्दा हुआ हूँ फिर से
तेरी सुरीली आवाज़ पर
सजाये है मैंने कई सपने
रातों को जाग-जाग कर

सपने ये सच होगें
यकीन है यह मुझको
होगा न कष्ट कोई
भरोसा मेरा है तुझको

 तेरे लिए सजाऊंगा अब
प्यारी दुल्हन-सी जिंदगी
कमी होगी न कहीं कोई
तेरे लिए मेरी है बंदगी

क किताब की तरह
मेरी जिंदगी खुली हुई है
हर पन्ने पर सुनहरे अक्षर
देख, तेरा नाम लिखा है

रोज फुर्सत से पढ़ना
बहुत संभल कर रखी है
प्रिये, सिर्फ तेरे लिए
रोज का पैगाम लिखा है

अनामिका जब छुएगी
मन के तार झंकृत होंगे
बज उठेगी फिर सरगम
जीवन में नए आयाम होंगे

तेरे लिए शमा बनकर
करूंगा रोशन हर राह
खुशियों भरा हो दामन
प्रिये, यही मेरी चाह|

 
(c) हेमंत कुमार दुबे