> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक

रविवार, 16 जून 2013

मानसून की पहली बारिश


 

 

खुली हुई खिड़की पर

गौरैया जब चहचहाई

सूरज की पहली किरण

जब बंद आँखों से टकराई

ठंढ़ी हवा का झोंका

जब पर्दों को लहरा गया

आँखें मलते-मलते

उठ बैठा मैं|

 

छत पर गमलों की कतार में

खिले थे कई पुष्प

जिनमें एक छोटी कली

भीगी-भीगी मुस्काई

हवा के झोंके से खिलखिलाई

और धीरे से कहा

जीवन की पहली बारिश

खूबसूरत होती है|

 

रात में जब जग सोया

मानसून की पहली बारिश में

धरती भीग रही थी

और मैं जानता हूँ

गर्मी के बाद बरसात

देती है राहत वैसे ही

जैसे लंबे अंतराल पर प्रिय मिलन

जिससे खिल उठता है

हर प्रेमी-प्रीतम का जीवन|


(c) हेमंत कुमार दुबे

 

मंगलवार, 4 जून 2013

तेरी यादें


 

 

मेरे जीवन में जब भी दुःख आया

तेरी मीठी यादों के सुख से दब गया

दिन सुख का जब जीवन में आया

तेरी यादों से उनका कद बढ़ गया

 

तेरी चुलबुली बातें और भोली हँसी  

मुझको हर दिन हर पल हंसाती है

तेरी यादों के सहारे मेरा जीवन चलता

वर्ना इस रूखे संसार में क्या रखा है |

 

© हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 1 जून 2013

यादों का पुल




जब हम मिले वर्षों बाद
सामने था यादों का पुल
लटकता हुआ
हमारी जिंदगी के दो छोरों से
जिस पर चल कर
हमें मिलना था
और फिर
इस पार या उस पार
जिंदगी को आगे बढ़ाना था

कितना खतरनाक लगता था
एक कदम बढ़ाते ही
पुल के टूटने का डर
गिर कर बिखरने का डर
रोंगटे खड़े करने वाला
भविष्य का डर

पर डर के आगे ही तो जीत होती है
और अब तक की जिंदगी में हार
न तुमने मानी थी न मैंने
तभी तो खड़े  थे
यादों के पुल के दो तरफ

हौसला देख कर एक दूजे को
अपने आप बढ़ गया
सांसों की गति को थामे
हमारा कदम पुल पर बढ़ गया

वह हिला जोरों से
चरमराया
पर हमारे कदमों को
रोक न पाया
और हार गया
हमारी हिम्मत और साहस के आगे
जीत का जश्न
गूंजने लगा चहुँ ओर |


© हेमंत कुमार दुबे

एक सुंदर-सा सपना




 

देखा मैंने एक सुंदर-सा सपना

पहाड़ी-नदी बह रही कल-कल

जल पी रहे थे किनारे हिरण

वन के पंछी करते किल्लोल

 

छोटा-सा एक गाँव बसा था  

सामने हरा-भरा मैदान फैला

भूरी, सफ़ेद, काली, चितकबरी

चरती गायें, बछड़े दिखाते कला

 

रंग-बिरंगे फूलों वाली बगिया

जिसके मध्य एक कच्चा घर

हर सुख-सुविधा से संपन्न

जिसमें रहता मेरा परिवार |

 

(c) हेमंत कुमार दुबे

रास-लीला



 

अधरामृत पान किया जिस गोपी ने

ना सुध-बुध खोए वो कैसे

मिलन की रात यमुना के तट पर

कान्हां संग रस रचाए ना कैसे

 

तुमसे ना रुकेंगी, हे ब्रजवासी

प्रेम में श्याम के वे दीवानी हैं

है प्राणों से प्यारा उनको मोहन

मुझको पता है, वे मेरे सखा हैं

 

नित दर्शन की अभिलाषा है उनको

मिलन की रात को जोहते दिन बीते हैं

हो प्रेम मगन, वे पथ में ही खड़ी

अपना प्राण-प्यारा सुंदर वे ढूंढे हैं

 

सखियों की दशा मोहन भी जाने

वे उनमें बसते, हृदय को पहचाने

रासलीला रचाई मोहन ने गोपियों संग

सुख देकर अद्वैत-भाव में जगाने |

 

© हेमंत कुमार दुबे

कुछ देर के लिए ही सही





 

कुछ देर के लिए ही सही

चलो मिल लो मेरे पथ में

रास्ता विकट है जीवन का

सुस्ता लो बैठ मेरे संग में

 

कुछ देर के लिए ही सही

समा जाओ तुम बाँहों में

भूल जाओ सारी कायनात

घुल जाओ मेरी सांसों में

 

कुछ देर के लिए ही सही

जी लूँगा तुम्हारे संग में

कोरा रहा तेरी राह देखता

रंग जाऊँगा तेरे रंग में

 

कुछ देर के लिए ही सही

निहारूंगा झील-सी आँखों में

खोज लूँगा गोता लगा कर

खुद को और खुदा को तुझमें

 

लिखा है तेरा नाम प्रिये

जीवन के पन्ने-पन्ने पर

तर जाऊँगा जो पढ़ लो

टेर है अब न लगाओ देर




© हेमंत कुमार दुबे

तुम आई तो ....


 

रक्तिम सूरज की किरणों से

जीवन पथ फिर से चमक उठा

बगिया में खिल उठे पुष्प सब

तुम आई तो जीवन महक उठा

 

तितलियाँ पंख खोल उड़ने लगी

भ्रमरों का गुन-गुन संगीत बज उठा

कोयल कूकी निबिया की डाली पर

तुम आई तो जीवन चहक उठा

 

सोये पंछी जागे, गौएँ रम्भाने लगीं

पण्डितों का मंत्र उच्चारण शुरू हुआ

बैलों के गले की घंटियाँ बजने लगीं

तुम आई तो जीवन फिर शुरू हुआ |

 

© हेमंत कुमार दुबे

शुक्रवार, 10 मई 2013

मैं तनहा नहीं हूँ


 

अँधेरे में क्या कर रहे हो?
जला लो घर की बत्तियाँ
थोड़ी रोशनी आने दो
अँधेरे को दूर जाने दो
तन्हाइयों से निकल कर
मिलो सब से
थोड़ा खुश हो लो
थोड़ा जी लो

अजी, नहीं!
आपको गलत फहमी है
मैं तनहा नहीं हूँ
अँधेरा तो मेरा मित्र है
जो मुझे मुझसे मिलाता है
अकेलेपन की जिंदगी से
राहत दिलाता है
उसकी यादों में डुबाता है
जिसमें खोकर
खुशी का सागर लहराता है

 
अँधेरे में ही तो हम दोनों
मीठी बातें बतियाते हैं
खुद ही सुनते हैं
खुद को ही सुनाते हैं
समस्याओं के समाधान
भविष्य की योजनाएं
घर और आफिस की बातें
देश की राजनीति
खेल कूद और सिनेमा जगत
पर्यटन की योजनाएं
और भी बहुत कुछ
सब अँधेरे में ही बनती हैं
चर्चित होती हैं
क्योंकि
अँधेरा हमें वो सुकून देता है
जिसकी तलाश में
भटकती है दुनिया
इसलिए कहता हूँ
छोडो मेरी चिंता यारों
मेरे साथ मेरा हम सफ़र है
मैं तनहा नहीं हूँ |

(c) हेमंत कुमार दुबे

गुरुवार, 9 मई 2013

जब तुमसे बात नहीं होती

 

जब तुमसे बात नहीं होती

चांदनी रात नहीं होती

घने बादल होते हैं नभ पर

बोलते उल्लू शाखों पर

अमावस सा घुप अँधेरा होता

कुछ भी सुझाई नहीं देता

 

जब तुमसे बात नहीं होती

तारों की सौगात नहीं होती

बिजली कडकती है

वज्र-सा आघात करती है

डरा हुआ मन मरता है

तन काँपता और तडपता है

 

जब तुमसे बात नहीं होती

जज्बातों की औकात नहीं होती

साँसे उखड़ती जाती हैं

धड़कने थमने लगती हैं

दिल से चीत्कार निकलती है

दम घुटने लगता है |

 

(c) हेमंत कुमार दुबे