> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : प्रश्नों के उत्तर

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

प्रश्नों के उत्तर


मैं,

अयोध्या नरेश राम,

तुमसे कहता हूँ,

तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर,

क्यों नहीं रखा नगर में,

अपनी गर्भिणी सीता को,

क्यों भेजा वन में ?

जंगल में ही तो ईश्वर प्राप्त रहते है,

और फिर वाल्मीकि का संग,

उनकी अमूल्य शिक्षा,

क्या मिल पाती तुम्हें अवध में?



लव-कुश,

अगर होते तुम अयोध्या में,

क्या तुम मुझ जैसे बन पाते,

फिर माँ तुम्हारी,

मेरी जानकी,

धरती पुत्री,

अपनों के बीच ही तो रही,

दूर नहीं थी मुझ से,

वन में रह कर भी,

यह तो कष्ट सहा,

केवल तुम्हारे लिए,

तुम्हें निखारने के लिए|


(c) हेमंत कुमार दुबे

3 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी गर्भिणी सीता को,
    क्यों भेजा वन में.... ?

    इस सवाल का परिणाम ,
    आज की सीता ,
    आज तक भोग रही हैं.... !!

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  2. आज न तो उस समय के राम ही हैं न सीता ही| राम और सीता तो प्रश्नों और तर्क से परे हैं, आदर्श है| उनके ऊपर आज नासमझ लोग प्रश्नों द्वारा कीचड़ उछालने का प्रयत्न करते है और जिसे देखते हुए उन्हीं के प्रश्नों के उत्तर स्वरुप यह कविता है|

    आज सीता है कहाँ? और कौन है इस युग में राम? हमारी सोच त्रेतायुग के राम तक पहुँच नहीं सकती| राम ने क्या और क्यों किया यह तो राम ही जानते थे| आज मनुष्य मनुष्य के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है इसकी एक झलक वर्षों पहले ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में दिखला दी है|

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  3. its really stunning , i have never go deep in the Holy Ramayana in so detail ,

    this is awesome , thanks for posting such blog

    Regards

    D K

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