> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : आत्मचिंतन

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

आत्मचिंतन


जिंदगी ख्वाब है,
ख्वाबों में भी जिंदगी है
दोनों ही झूठे,
केवल तुम सच्चे हो|

सच की परिभाषा
सच ही जाने,
बाकी सब तो हैं
झूठे झूठके दीवाने|

दिखता है जो
मिट जायेगा,
चाहे हकीकत
या हो सपना|

जिससे दिखता है
उसको जब जानो,
सब विस्तार तुम्हारा,
फिर भी तुम निर्लेप -- सच्चे|


(C) हेमंत कुमार दुबे

**  सदगुरूदेव भगवान के प्रवचन और कृपाप्रसाद  से जो जाना वही कविता के रूप में प्रस्तुत किया हूँ **

1 टिप्पणी:

  1. जिंदगी ख्वाब है,
    ख्वाबों में भी जिंदगी है
    दोनों ही झूठे,
    केवल तुम सच्चे हो|
    Bahut achhe..Dhanyawad..

    उत्तर देंहटाएं