> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : कसक

रविवार, 9 दिसंबर 2012

कसक



जब मिली थी तुम पहली बार
उसने कहा था तुमसे
'मिलने आया हूँ क्योंकि
सपने में तुमने मुझे बुलाया है
आज सबेरे ही
मुर्गे ने बाग दे जगाया है
और जो हो सकता है साकार
उस स्वप्न से कैसे करूँ इंकार?'

शर्मा कर तुम्हारा मुस्कुराना
उसके साथ बेंच पर बैठ जाना
आत्मीयता से बतियाना
कुछ सुनना कुछ सुनाना
उसे भा गया
तुम्हारे मन में कुछ है
बता गया

मुलाकातों का
बैठकों का
मीठी बातों का
सपनों का
सिलसिला चलता रहा
न तुमने कहा
न उसने कहा
प्यार भीतर-भीतर पलता रहा

तुम्हें जीवन में आगे बढ़ना था
किसी बंधन में नहीं बंधना था
उसको नियति पर नहीं भरोसा था
और नियति ने उसके लिए
कुछ और ही सोचा था

राहें जुदा हुईं
एक मोड़ पर तुम फिर मिले
अस्वीकृति के डर ने
मन का चलने न दिया
उसने लबों को सी दिया
मन को समझा दिया
प्यार को दफना दिया

उसके अन्दर
कसक है
टीस है
भीड़ में तन्हाई है
जिंदगी से रुसवाई है

कसकता है
देख तुम्हारा मशीनी जीवन
सुबह से शाम की थकन
न चैन, न आराम
सिर्फ भागमभाग

तुम्हारे लिए कुछ न कर पाने की
मजबूरी अपनी देख
वह कराह उठता है
दर्द से तडपता है

सीने में दफ़न
प्यार की मजार पर
रोते दिल को देखकर
पल-पल उठती है कसक -
अनजान डर से क्यों डरता रहा
जुदा होकर पल-पल मरता रहा
क्यों न किया इजहार
जब किया तुमसे प्यार
तीन शब्द
जिंदगी बदल जाते शायद|

(c) हेमंत कुमार दूबे










1 टिप्पणी:

  1. वाह . बहुत उम्दा प्रस्तुति
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