> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : तुम्हारे खत

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

तुम्हारे खत


जला आया हूँ,
तुम्हारे लिखे खतों को,
जो मेरे पास थे
रखे हुए सहेज कर,
अब फैल गये है
हवा के संग,
धुआं बन कर|

पर बाकि है एक उम्मीद -
उस हवा का कोई झोंका
तुम तक पहुँचे
और याद दिलाये,
तुमने जो लिखा था,
जिससे मेरा दिल
वर्षों तक दु:खा था |

आज सुकून है,
पर भूला नहीं तुम्हे,
आगे भी नहीं मुमकिन,
क्योंकि  -
धुएं का एक कतरा
मेरी सांसों के साथ
फेफड़े में बस गया है,
मरते दम तक
तुम्हारी याद दिलाने को |


(c) हेमंत कुमार दुबे

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज सुकून है,
    पर भूला नहीं तुम्हे,
    आगे भी नहीं मुमकिन,
    क्योंकि -
    धुएं का एक कतरा
    मेरी सांसों के साथ
    फेफड़े में बस गया है,
    मरते दम तक
    तुम्हारी याद दिलाने को |

    ***punam***
    bas yun...hi..

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