> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : गुड मोर्निंग

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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

सुप्रभात

उषाकाल कमरे में आना,
चाय की प्याली के साथ
कोमल, गर्म – नरम हाथों से
दे जाना गालों पर -
एक थपथपाहट|

धीरे से खिड़कियों के परदे खिसकाना,
लौह-जालियों के बीच से,
गुनगुनी धूप का छन-छन,
कमरे को रोशनी से भर जाना|

तुम्हारी उंगलियां जब हौले से छुएंगी,
मेरे अर्धोन्मीलित नेत्र देखेंगे -
तुम्हारे गुलाबी होठों पर
स्निग्ध मंद-स्मित, और
दिल की धडकन कहेगी –
सुप्रभात, मेरे प्यार|

(c) हेमंत कुमार दुबे