> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : June 2012

रविवार, 10 जून 2012

ते नर दुर्लभ


सबसन प्रीति, दया, मैत्री,
माता सम देखहिं पर-स्त्री |
ते नर दुर्लभ यह जग माहिं,
राम नाम जे जपहिं सदाहिं |

काहू के निंदा करहीं न सुनहिं,
परहित धर्मं निरत नित रहहिं |
वेद-पुराण सम्मत मत कहहिं,
काम, क्रोध, मद, लोभ ते डरहिं | 

ब्रह्म विचार मगन जे रहहिं,
आत्मवत सब देखहिं कहहिं |
'हेमंत' तिनकर सदा बलिहारी
आत्मदेव के जे होहिं पुजारी |

गुरुवार, 7 जून 2012

उलझन



भ्रष्ट नीतियों से हुई देश की बेहाली पर रोयें
या बढ़ती मंहंगाई से अपनी तंगहाली पर रोयें
हमारे ही नोटों से सत्ता काबिज करने वाले
बता दे ओ मन के मोहन पहले किस पर रोयें ?

(c) हेमंत कुमार दुबे