> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : September 2013

सोमवार, 30 सितंबर 2013

उसका आना




वो ऐसे आई जीवन की सूनी सड़क पर
जैसे तेज रफ़्तार वाली लाल फरारी
नजर उठाकर जबतक मैं उसे देखता
धूल के गुबार ने बदल दी दुनिया सारी|

(c) हेमंत कुमार दूबे

शनिवार, 21 सितंबर 2013

তুমাৰ নাম / तुम्हारा नाम




কী কৰুঁ, কত জাউ, পথ মুকে না বুজায়
ঘন বন, ভোৰিত কাঁইট, কেঁকণি উলায়
প্ৰকাশবিহীন কলা ৰাতি, মন ভয় পায়
এই সময় তুমাৰ নাম মুখত উলাই পায় |

(c) হেমন্ত কুমাৰ দুবে

-------------------------------- हिंदी अनुवाद------------

क्या करूँ, कहाँ जाऊं, सूझती नहीं है राह
गहन वन, पैरों में कांटे, निकलती है आह
काली अँधेरी रात, मन मेरा डर जाए
ऐसे समय तुम्हारा नाम मुख से निकल जाए |

(c)    हेमंत कुमार दुबे

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

सिर्फ तुम्हारे लिए



होंठों से जो गीत लिखता हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए
सुन कानों से ह्रदय में संभाल लेना प्रिये मेरी
सोना-चांदी-हीरे-जवाहरात नहीं देने को तुम्हें
हवा की तरंगों पर लिख भेजी दास्ताँ सुनहरी|

(c) हेमंत कुमार दूबे

माँ रोज मिलती है



वो मुझसे हररोज मिलती है
कानों में प्यार भरे शब्द कहती है
मुझे निहारती और दुलारती है
कोमल कर स्पर्श से थकान हरती है
'हेमंत' माँ दूर दराज गाँव में रहती है
पर सपनों में तो सदा पास होती है|

(c) हेमंत कुमार दूबे
http://poetrystream.blogspot.com/

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

तीन क्षणिकाएँ



मैं उनके नाम की माला जपता रहा
उन्होंने घर को ही आग लगा दी
परमात्मा में जब आत्मा मिल गयी
उन्होंने मेरी राख यमुना में बहा दी |

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चींटे को बार बार दूर करता हूँ
फिर भी वह मेरे पास आता है
बेवफा इंसानों से तो अच्छा है
उससे शायद कोई पुराना नाता है |

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तुम एक कलमा ही पढ़ दो
मेरी मजार पर फूल रखकर
जन्नत मिल जायेगी मुझको
या जी उठेगी रूह सुनकर |

(c) हेमंत कुमार दूबे

बुधवार, 4 सितंबर 2013

धरती



श्वेत, पीत, गुलाबी, नीले
रंग अनेक  कुसुम सुगन्धित
धानी चुनर ओढ़े धरती
अरुण रश्मि से आलोकित

वर्षा ऋतु में किये नव सृंगार
पालिनी सब जड़-चेतन की
विस्तृत नील गगन के नीचे
सुन्दर लगती है दुल्हन जैसी

(c) हेमंत कुमार दूबे

अद्वैत भावना



अबतक जो देखा सुना था
नाम रूप से बंधा हुआ था
मिलकर पंचतत्वों से  सबकुछ
काया माया सब गुंथा हुआ था

संग किया जब सत् का मैंने
मेरी तेरी की सब मिटी भावना
यारी सारी मोहन से हो गई
है एक ही ईश्वर बनी दृढ धारणा

वह यह का भेद दूर हुआ
मुझको मिली हरि रस की प्याली
प्राण हुआ ईश्वर में प्रतिष्ठित
प्यारी है ज्ञान-ज्योत निराली उजियाली |


(c) हेमंत कुमार दूबे