> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : May 2013

शुक्रवार, 10 मई 2013

मैं तनहा नहीं हूँ


 

अँधेरे में क्या कर रहे हो?
जला लो घर की बत्तियाँ
थोड़ी रोशनी आने दो
अँधेरे को दूर जाने दो
तन्हाइयों से निकल कर
मिलो सब से
थोड़ा खुश हो लो
थोड़ा जी लो

अजी, नहीं!
आपको गलत फहमी है
मैं तनहा नहीं हूँ
अँधेरा तो मेरा मित्र है
जो मुझे मुझसे मिलाता है
अकेलेपन की जिंदगी से
राहत दिलाता है
उसकी यादों में डुबाता है
जिसमें खोकर
खुशी का सागर लहराता है

 
अँधेरे में ही तो हम दोनों
मीठी बातें बतियाते हैं
खुद ही सुनते हैं
खुद को ही सुनाते हैं
समस्याओं के समाधान
भविष्य की योजनाएं
घर और आफिस की बातें
देश की राजनीति
खेल कूद और सिनेमा जगत
पर्यटन की योजनाएं
और भी बहुत कुछ
सब अँधेरे में ही बनती हैं
चर्चित होती हैं
क्योंकि
अँधेरा हमें वो सुकून देता है
जिसकी तलाश में
भटकती है दुनिया
इसलिए कहता हूँ
छोडो मेरी चिंता यारों
मेरे साथ मेरा हम सफ़र है
मैं तनहा नहीं हूँ |

(c) हेमंत कुमार दुबे

गुरुवार, 9 मई 2013

जब तुमसे बात नहीं होती

 

जब तुमसे बात नहीं होती

चांदनी रात नहीं होती

घने बादल होते हैं नभ पर

बोलते उल्लू शाखों पर

अमावस सा घुप अँधेरा होता

कुछ भी सुझाई नहीं देता

 

जब तुमसे बात नहीं होती

तारों की सौगात नहीं होती

बिजली कडकती है

वज्र-सा आघात करती है

डरा हुआ मन मरता है

तन काँपता और तडपता है

 

जब तुमसे बात नहीं होती

जज्बातों की औकात नहीं होती

साँसे उखड़ती जाती हैं

धड़कने थमने लगती हैं

दिल से चीत्कार निकलती है

दम घुटने लगता है |

 

(c) हेमंत कुमार दुबे