> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : February 2013

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अब न दगा देगा



जिसने जुदाई का दर्द दिया है
मिलन रूपी दवा भी वही देगा
पावों में चलने की शक्ति दी
मंजिल तक पहुंचा भी वही देगा

जिसने रुख मोड़ा जिंदगी का
रास्ता और दिशा वही देगा
छुडाया था साथ जिसने
कभी तो मिला ही देगा

दिवार बनाई थी जिसने
एक दिन ढहा भी वही देगा
भरोसा था भरोसा रहेगा
मेरा यार है वो अब न दगा देगा |

(C) हेमंत कुमार दुबे
 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हम




सखी
इधर उधर क्या देखती हो
चंचल नैनों से
क्या मुझे ढूँढती हो?

हवाओं ने जो तरंगें
तुम्हारे कानों तक पहुंचाईं
उन तरंगों में
मैं हूँ

अरे सखी
अभी तुम्हारा पल्लू खिसकाया जिसने
वह पवन भी मैं हूँ

तुम्हारे पैरों की थिरकन
पायल की छम-छम
नृत्य और गीत
और कोई नहीं
मैं ही हूँ
मनमीत

मत देखो इत-उत
थोड़ी देर के लिए
कर लो आँखें बंद
सांसों की गति को
कर लो मंद –
तालबद्ध

कुछ सोचना नहीं
मन को भटकाना नहीं
बाधित करो चंचल को!

झाँकों, भीतर
गहरे
और गहरे
सुनो अंतर्नाद
महसूस करो आह्लाद

तुम्हारी रगों में
नस-नाडीयों में
सांसों में
धडकन में
एक संगीत बज रहा है

प्यारी सखी
अपने में जागो
सुनो यह ब्रह्मनाद
अनादिकाल से
जो बज रहा है

देखो, अपनी दिव्य दृष्टि से
कण-कण में व्याप्त
जिसे लोग कहते हैं
ईश्वर की सृष्टि
वह हमसे अलग नहीं
परिवर्तित होती
क्षण-क्षण उपजती
विलीन होती
अपना ही पसरा है
द्वैत नहीं कहीं
अद्वैत हम
अद्वैत हमारा है

दूर नहीं
विलग नहीं तुमसे
अब मत ढूँढना मुझको
मिला-मिलाया तुमसे
तुममें रचा बसा मैं
मुझमें तुम

एक
अचल
अनादि
अविनाशी
सब घटवासी
यत्र-तत्र
सर्वत्र
हम
और केवल
हम|

(c) हेमंत कुमार दुबे

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

सात क्षणिकाएँ




                  (१)

अनामिका जब भी उठती है
मिल कर अंगूठे संग चलती है
निश्चय जानो शुभ होता है
भाल तिलक होता विजय होती है|


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                 (२)

एक झलक मिल गयी खुदा के पैगाम की
धीरे से चंद लफ़्ज जो तुमने कह दिया
एक आस बांध गयी विश्वास बढ़ गया
रेत पर जो तुमने मेरा नाम लिख दिया...
 
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                 (३)
 
प्यार के बारे में पूछा जो उनसे
न इजहार किया, न इन्कार किया
नजर भर के देखा, मुस्कुरा दिया
मैं पागल दीवाना हो गया |
 
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                  (४)
 
कुछ और नहीं तो इतना करना
जब डोली उठे पिय घर के लिए
नैनों से दो मोती लुढ़का देना
दौलत बन जायेंगे मेरे सफ़र के लिए |
 
 
******************************
 
                   (५)
 
मेरी जिंदगी की अजब कहानी है
धूप छाँव की जुबानी है
यहाँ तक तो चल जाएगा
कमबख्त रात क्यों होती है|
 
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                   (६)
 
भगवन
जो जुदाई का दर्द दिया तुमने
आँसू नहीं निकले बाहर
भीतर ही जहर बन गए
मैं हँस नहीं सकता
रो भी नहीं सकता
पल पल मर रहा हूँ
बचा सकते हो
यही चुनौती है
तुम्हारे लिए..
 
******************************
 
                   (७)
 
मेरा खत उसके दुश्मन को दिला दिया
बेदर्दी से दो दिलों का खून हो गया
मैंने माना तुमको अपना सखा भगवन,
छलिया, तुमने हमें ही छल लिया|
 
(c) हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

मैं क्या करूँ?


 

 
मेरे दिल की बात को न समझी तू
हो रही नाराज सदा, मैं क्या करूँ ?

पीने को मैंने दिया दूध का प्याला
तुझे नजर आया जहर, मैं क्या करूँ?

निःस्वार्थ प्यार किया तुझसे जानी
तुझे दिखा स्वार्थी रूप, मैं क्या करूँ?

तपती दोपहरी में लाया वृक्ष की छाँव
तूने फिर भी खोजी धूप, मैं क्या करूँ?

सुगन्धित सुमन माला मैंने पहनाई
तुझे लगी लौह जंजीर, मैं क्या करूँ?

कर्मों का सब हेर फेर मैं समझ गया
तू समझ न पाए तो बता, मैं क्या करूँ?

 
(c) हेमंत कुमार दुबे

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

तेरे लिए




जिन्दा हुआ हूँ फिर से
तेरी सुरीली आवाज़ पर
सजाये है मैंने कई सपने
रातों को जाग-जाग कर

सपने ये सच होगें
यकीन है यह मुझको
होगा न कष्ट कोई
भरोसा मेरा है तुझको

 तेरे लिए सजाऊंगा अब
प्यारी दुल्हन-सी जिंदगी
कमी होगी न कहीं कोई
तेरे लिए मेरी है बंदगी

क किताब की तरह
मेरी जिंदगी खुली हुई है
हर पन्ने पर सुनहरे अक्षर
देख, तेरा नाम लिखा है

रोज फुर्सत से पढ़ना
बहुत संभल कर रखी है
प्रिये, सिर्फ तेरे लिए
रोज का पैगाम लिखा है

अनामिका जब छुएगी
मन के तार झंकृत होंगे
बज उठेगी फिर सरगम
जीवन में नए आयाम होंगे

तेरे लिए शमा बनकर
करूंगा रोशन हर राह
खुशियों भरा हो दामन
प्रिये, यही मेरी चाह|

 
(c) हेमंत कुमार दुबे

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

क्यों?



एक वो दिन जब प्यार भरे खत
डाकिया हर हफ्ते दे जाता था
तुम्हारे हाथों की खुशबू पाकर
मेरा गुलशन महक जाता था

जो दिल की जुबानी लिखी मैंने
तो ऐसा क्या हुआ और क्यों
गुस्ताखी ऐसी क्या हो गयी
तेरी चाहत में जहर घुला क्यों

तुमने नफ़रत भरा खत लिखा
मैंने फिर भी तुमसे प्यार किया
कभी मिलोगी तो पूछूँगा, क्यों
इस आस में एक उम्र गुजार दिया|

(c) हेमंत कुमार दुबे

याद कर बचपन के दिन





शब्दों की चहलकदमी से
चलो आज चुप्पियों को तोड़ते हैं
याद कर बचपन के दिन
एक नया रिश्ता जोड़ते हैं

भटक रहे थे बड़ी देर से हम
मार्ग-दर्शन एक-दूजे का करते हैं
ब्रह्मपुत्र में बड़ी दूर आईं किश्तियाँ
फिर से किनारों की ओर मोड़ते हैं

चलो पगडंडियों पर चलते हुए
पहाड़ी पर इन्द्र-धनुष देखते हैं
देवपानी नदी के तट पर
चमकीले-चिकने कंकड खोजते हैं

रोइंग की न्यू कालोनी में
खेल वही पुराने खेलते हैं
लौट आएँगी वही खुशियाँ
बिखरे मोतियों को पिरोते हैं

सुंदर शब्दों के अरण्य में
चलो भविष्य पथ खोजते हैं
कुछ कहते कुछ सुनते
संग जीवन में आगे बढते हैं|

(c) हेमंत कुमार दुबे
http://poetrystream.blogspot.com

शायद तुमने महसूस किया



तुम्हारी खनकती हुई हंसी में
मैंने एक दर्द महसूस किया
जो लम्हा बातों में बीता
उस वक्त को मैंने जिया

कहने सुनने की बात बहुत
अधरों ने लेकिन साथ न दिया
महसूस किया जो मैंने
शायद तुमने महसूस किया|

(c) हेमंत कुमार दुबे

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

महसूस तुझे है करना



बरसों की चुप्पी के बाद
जब बजेगी फोन की घंटी
क्या होगा मेरा हाल
सोच सिहर उठता है बदन

जब गूंजेंगे कानों में
बोल तुम्हारे खनकते हुए
चूडियों की तरह
और वही पुरानी चिर-परिचित
सुबह के समय चहचहाती चिड़ियों सी
सुनाई देगी मृदुल हँसी

ढो रहा इस तन को कबसे
तेरी खातिर
क्या जिन्दा हो जाऊँगा?
या फिर
मन्त्र-मुग्ध सा
सपनों में खो जाऊँगा?
या खुशी के मारे
दिल पर काबू न पाकर
एक बार पुन: मर जाऊँगा?

क्या होगा अंजाम मेरा
इस चक्कर में नहीं पड़ना
तेरे बोली को सुन
जीवित हो कर
महसूस तुझे है करना
दूर सही मीलों तुझसे
पर क्षण भर का सुख पाकर
स्वीकार मुझे है मरना|
 

(c)  हेमंत कुमार दुबे

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

तुझको कैसे भुलाऊं और क्यों..



दिल में जब तेरी मूरत बिठाई है
दीवालों पर तस्वीर सजाऊं क्यों
बसता है जब तू मेरी सांसों में
तुझको कैसे  भुलाऊं और क्यों..


दिलबर तू करता हर इच्छा पूरी
नश्वर चाहों के लिए दौडाऊं क्यों
मन तुझ में ही रम रहा है
संसार में फिर रमाऊँ क्यों .....

हर खुशी और गम में तू शामिल है
तुझसे फिर कुछ भी छुपाऊं क्यों
एकमात्र तू ही सलाहकार है मेरा
गोपनीयता  कैसे निभाऊं और क्यों  ...

(c) हेमंत कुमार दुबे




१४ फ़रवरी

 

जब खुद से पूछा, किसने मुझसे सच्चा प्यार किया है

कौन है वो शख्स जिसने जीवन को गुलजार किया है 

हँसा-रोया कौन मेरे संग, किसने मेरे लिए कष्ट सहा है

सुनाता हूँ सुनो गौर से, मेरे दिल ने आज क्या कहा है

 

सबसे पहले दिल ने एक सुन्दर चलचित्र दिखाया है

नेपथ्य से आती आवाजों ने दृश्यों को समझाया है

बचपन से जवानी तक सफ़र फिर से दिखलाया है

हर तस्वीर में माता-पिता का चेहरा नजर आया है

 

तथ्यों को भूला बैठा था, सच्चाई से मुँह मोड़ा था

झूठे प्रेम का दीवाना बना, सच्चे प्रेम को छोड़ा था

पश्चात्य संस्कृति के चक्कर में जो पड़ा हुआ था

आदर्शों से दूर हुआ मैं, भटकता हुआ भगोड़ा था

 

नजरों से निहाल करते माता-पिता मेरे नजर आये

उनके प्रेम-प्रकाश के आगे कोई नहीं जो टिक पाये

प्रेम का दम भरने वाली प्रेमिका ने भी गम हैं दिये

माता-पिता ही सच्चे हितैषी सुख-दुःख में सच्चे साये

 

निःस्वार्थ प्रेम जो करते हमसे उनका ही गुण गायें

फूल गुलाब का उन्हें भेंट दे चरणों में शीश झुकाएं

आओ १४ फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएँ

माता-पिता की सेवा से अपना जीवन सफल बनाएं|

 

(c) हेमंत कुमार दुबे

मनमीत




जो रोज याद आते हैं वे दिल में बसे होते है
उनको याद करते ही जीवन में फूल खिलते हैं
महकती हैं साँसें चहुँओर संगीत होता है
बहती है जीवन-धारा वे मनमीत होते हैं ......


(c) हेमंत कुमार दुबे