> काव्य-धारा (Poetry Stream): जीवन, प्यार और आत्मा-झलक : February 2012

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

चुनावी दंगल



दंगल देखने के लिए उत्सुक

नारे लगाती हुई जनता

जुटी है अपने-अपने मनसूबे से

मैदान के चारों तरफ |

पहलवान अपने तन पर

लज्जा को ढकने के लिए

पहने हैं सिर्फ लंगोट,

बाकी अंग वस्त्रविहीन |

ये नेताओं से अच्छे हैं,

जो खड़े चुनावी दंगल में,

फिरते सड़कों पर,

मोहल्ले की गलियों में,

उछालते कीचड विरोधियों पर,

उड़ाते धूल चार-पहियों से

जनता की आँखों में |

नेताओं के तन पर

सफ़ेद कपड़े होते हैं, पर

दिल से होते है नंगे,

काले, भेड़ियों जैसे|

अच्छा व्यक्ति भी संग इनके,

बनता है धूर्त भेड़िया,

औरों का हक खाने वाला,

पत्तल में छेद करने वाला|

नेता और उनके चमचे,

जब आ जाते हैं,

जनता बोलती नहीं,

सिर्फ सुनती है, और

देती है अपना निर्णय,

चुनावी दंगल में वोट ड़ालकर |



(c) हेमंत कुमार दुबे

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

प्यार का त्यौहार




प्यार का त्यौहार जब मनाओगे,

दोगे प्रेमिका को फूल और तोहफा,

मत भूलना उस दिन उनको,

जिनके प्यार ने तुम्हें जन्माया,

पाला-पोसा, बड़ा किया,

वो ही, जिन्हें तुमने

प्रेमिका के नैनों से

डसे जाने के पहले,

किया है जान से बढ़कर प्यार|



१४ फरवरी को मनाओ,

दिवस मातृ-पितृ पूजन का,

और पूजो अपने जन्मदाता को,

रोली-चंदन लगाकर,

आरती उतारकर,

चरणों में सिर झुकाकर,

क्योंकि –

वही करते हैं सच्चा प्यार तुमसे,

बाकी तो सारे बुनते है,

जाल छलावों के|



माँ-बाप ही सच्चे हितैषी,

रब से मिलानेवाले हैं,

और तो सब साथी स्वार्थ के,

चमड़ी के प्रेमी हैं|



अगर होता सच्चा

प्रेमी-प्रेमिका का प्यार,

तो कभी टूटते न दिल,

न बिखरता घर-संसार |



आर्य! धोखे में आना नहीं,

पश्चिम की जहरीली हवा से,

वहाँ की चकाचौंध से,

क्योंकि एक दिन ऐसा होगा -

दम घुटने लगेगा तुम्हारा भी,

जैसे घुटता है उनका,

भोगी संस्कृति के जो पोषक,

और जो पा रहे हैं नव-जीवन

तुम्हारी निर्मल हवा से,

आध्यात्मिक संस्कृति से|



जो बन रही पश्चिम का जीवन,

पूरब की उस अपनी बयार को, अगर

तुम ही दूषित बनाओगे,

फिर कैसे जी पाओगे|



सुन्दर चमड़ी से नहीं,

प्यार करो आत्म से,

ईश्वर से, खुदा से,

अपने माँ-बाप से,

भाई-बहन से,

हर जीव में बैठे रब से|




(C) हेमंत कुमार दुबे

कृपया यह भी देखें : १४ फरवरी को क्या करें ?


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

सुप्रभात

उषाकाल कमरे में आना,
चाय की प्याली के साथ
कोमल, गर्म – नरम हाथों से
दे जाना गालों पर -
एक थपथपाहट|

धीरे से खिड़कियों के परदे खिसकाना,
लौह-जालियों के बीच से,
गुनगुनी धूप का छन-छन,
कमरे को रोशनी से भर जाना|

तुम्हारी उंगलियां जब हौले से छुएंगी,
मेरे अर्धोन्मीलित नेत्र देखेंगे -
तुम्हारे गुलाबी होठों पर
स्निग्ध मंद-स्मित, और
दिल की धडकन कहेगी –
सुप्रभात, मेरे प्यार|

(c) हेमंत कुमार दुबे